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व्यंग्य : शव की बेचैनी और आत्मा को सुकून

अब तो शव बहुत बुरी तरह से बिफर गया था।यह शव विक्रमार्क के कांधे पर लटका बेताल का शव नहीं था बल्कि कोरोना का सताया हुआ आदम जात था ।कितनी बेइज्जती, मान-सम्मान भी नहीं, तिरस्कार और उपेक्षा!उफ्फ!उसे बहुत अफसोस हो रहा था कि उसे इस स्थिति में कोरोना काल में ही आना था।शव ने अपने भीतर से निकली आत्मा को धिक्कारा-” क्या तुम और कुछ दिन ठहरने का प्रबन्ध नहीं कर सकती थी!और फिर तुम्हें जाना ही था तो चार महीने पहले निकल लेना था,कम से कम मुझे भी गाजे-बाजे के साथ निकाला जाता।ऐसी दुर्गति तो नहीं होती।अब तो तुम्हारी शांति के वचन और कोई उपाय भी नहीं होंगे और न ही सार्वजनिक तौर पर आँसू बहाऊ कार्यक्रम होंगे।”

“अरे,इसमें मेरा क्या कसूर है।कोरोना ने एकदम से आकर चपेट में ले लिया था।तुम भी तो कमजोर निकले।देवदूतों ने अपनी शरण में तो ले ही लिया था लेकिन वे भी क्या करते !दारू-शारू के चक्कर में न पड़ते तो तुम्हारा इम्यून सिस्टम भी ठीक रहता और रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती।मैंने कहा भी था कि योग करो,व्यायाम करो लेकिन तुम भोग में तल्लीन रहे,मैंने काढ़ा पीने का कहा तो तुम कलाली खोजते रहे।तुमने हर जगह तो मेरी आवाज को दबा दिया।मैंने कहा भी कि घर में ही रहो,घर से बाहर मत निकलो किन्तु नेतागिरी के चढ़ चुके भूत ने समाज सेवा का दिखावटी जलवा दिखाने के लिए बिना गमछा,मास्क और हाथों को सेनीटाइज किये भीड़ में चार पूरी और छटाक भर सब्जी बांटने की सेल्फी में यह दिन दिखा दिया।कोरोना के लपेटे में आने के बाद तो तुम्हें देवदूत भी यमदूत दिखाई दे रहे थे।वैसे तो यह सही है कि इस जहान में यमदूतों की संख्या बहुत बढ़ गई है, उन्हें ऊपर से आने की जरूरत ही नहीं है लेकिन तुम खुद ही देख लो कि यहाँ-वहाँ कितने देवदूत तुम्हारे आस-पास थे जो तुम्हें यमदूतों से छुड़ा लेना चाहते थे।”

“हाँ,तुम्हारा कहना गलत नहीं है लेकिन मैंने ऊपर वाले की कितनी इबादत की,दान-धरम भी किया।उसके बंदे का हर कहा माना।फिर भी!और अब देखो ,घर वालों ने ही छूने से मना कर दिया।लगता है कि लावारिस ही मर गए।सारे रस्मों-रिवाज छोड़कर निपटाने की फिराक में हैं।वह तो अच्छा है कि बेचारे ये देवदूत आ गए जिन्होंने अस्पताल में ही पूरी तरह से पैक कर सेनीटाइज कर दिया ताकि घर के लोग संक्रमित न हों।इसके बाद भी देखो घर के लोग कैसे दूर-दूर खड़े हैं।यह तो अच्छा है कि ये देवदूत वाहन में मुझे लेकर यहाँ तक आ गए और अंतिम यात्रा में मुख्य भागीदार बन गए।एक अखरने वाली बात यह भी है कि आज शोक सभा करने वाला भी कोई नहीं है।जो पहले इसी खोज खबर में रहते थे कि कोई सटका की नहीं और मसान में दौड़ लगा जाते थे अपने इष्ट-मित्रों के साथ, वे भी धोखा दे गए।शायद कोरोना ने ही उनके साथ ज्यादती की है।”

शव की ऐसी बातें सुनने के बाद भी आत्मा शांत चित्त थी।वह उसकी मिथ्या और निरर्थक बातों पर ध्यान नहीं दे रही थी और सोच रही थी कि जितनी जल्दी इसका काम तमाम हो तो वह भी सुकून के साथ अपनी राह पकड़े।

डॉ प्रदीप उपाध्याय,
16,अम्बिका भवन, उपाध्याय नगर,
मेंढकी रोड़, देवास,म.प्र.

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