न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

सुख का सही रास्ता है भोंदू-पंथ!

जो सुख चाहे जीव को तो भोंदू बनकर जी! पागल बनकर ठाला बैठ, कर्जा कर घी पी। कर्जा कर जा और शान से मर जा! इधर गोबर गणेश, भोंदू और डपौल बने रहने के ज्यादा फायदे दिखाई दिए हैं। घर से लेकर ऑफिस और सड़क से लेकर संसद तक! सभी जगह है भोंदू महाराज ऐसो आराम करते दिखाई पड़ते हैं। घर में कोई भी काम हो तो घर के सभी सदस्य भोंदू महाराज को कोई काम नहीं देते हैं। सबकी एक ही राय होती है। इसे काम दिया नहीं और बिगाड़ा किया नहीं। बेचारे दूसरे फंसते रहते हैं और भोंदू बने महाराज पड़े-पड़े हंसते रहते हैं। हर ऑफिस की तो यही कहानी है। बॉस नाम का सांप उसे ही काटता है, जो अक्सर काम करने की होशियारी दिखाता है। जो हर काम में आगे बढ़ता है, उसी को बॉस और काम देकर उसी के ऊपर चढ़ता है। अरे! इससे यह काम नहीं होगा! यह क्या कर सकता है? यह तो बिल्कुल बेवकूफ है! इसे काम करना ही नहीं आता है! ऐसे काम तो सिर्फ तुम ही कर सकते हो। ऐसे स्तुति गायन करके बॉस सिर्फ काम करने वाले जीव को और काम देकर उसे काम की सीढ़ी पर चढ़ा देता है। ऐसी बातें सुन-सुनकर भोंदू नाम का जीव अपनी निजी होशियारी पर हंसता रहता है और घानी का बैल बना अन्य जंतु इसमें जरूर फंसता है। इस ऑफिस से उस ऑफिस, इस घर से उस घर तक ऐसे भोंदू नाटक-बाज बिखरे पड़े हैं। कई भोंदू ऐसे हैं जो सड़क चलते-चलते अच्छे-खासे बेवकूफ पुलिस वालों को भी बेवकूफ बना कर निकल पड़ते हैं। वे नासमझी का, गोबर गणेश होने का, डपौल होने का ऐसा ड्रामा करते हैं, कि सामने वाला इनसे पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझने लगता है। जान कर भी अनजान बनकर अपनी मौज में रहना; इन भोंदू सज्जनों को खूब आता है। अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, टाइप की विचारधारा की धारा में बहने वाले डपौल जीवों को मैं प्रणाम करता हूं। संसद में भी ऐसे कई डपौल जीव पड़े हैं। वे अपनी निजी स्वार्थपरती समझदारी लिए नासमझी पर अड़े हैं। वे स्वयं कहते हैं, हम तो जाने किसके पैरों पर खड़े हैं। ऐसे जीवों का अपना एक अंतरराष्ट्रीय गीत है- जो सुख चाहे जीव को भोंदू बनकर जी! मैं कई अवसरों पर ऐसा भोंदू बनकर जीने की कोशिश करता हूं लेकिन कामयाब नहीं हो पाया हूं। कोशिश करता हूं कि चुपचाप बैठा रहूं और बीच में कुछ नहीं बोलूं। किसी भी मामले में अपनी कोई राय नहीं दूं। लेकिन कमबख्त मेरी आत्मा ऐसी है कि बीच में ही बोल उठती है। कार्य चुनौती भरे पान के बीड़े को चबाने के लिए मुंह को आदेशित कर देती है। मेरे ऐसा करते ही समस्त भोंदू जीव मन ही मन मुस्कुराने लगते हैं। भोंदू असल में मुझे भोंदू कहते हैं। वे फिर सामूहिक गीत गाते हैं- लो जी यह भोंदू आखिर हमारे चक्कर में फंस ही गया। दरअसल सभी भोंदू उस जीव को भोंदू समझते हैं जो बुद्धिमान-होशियार बनकर सरकारी कामकाज को तेज और सही करने में उस्ताद-गिरी दिखाता हो। अगर किसी के पास भोंदू-डपौल बनाने की कोई वैक्सीन हो, तो मैं लगवाने के लिए तुरंत तैयार हूं। जो आनंद भोंदू बनकर रहने में है, वह बुद्धिमान बनकर रहने में कहां है श्रीमान जी! जो मजा कर्जा करते हुए एसी में लेटकर पिज्जा-बर्गर खाने में है, वह दिन रात कमाकर ईमानदारी दिखाने में कहां है, श्रीमान जी!

 

रामविलास जांगिड़

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar