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गर्व का विषय टीकाकरण अभियान का दूसरा चरण

एक मार्च से देश में कोरोना वैक्सीन के टीकाकरण का दूसरा चरण शुरू हो गया है। कोरोना वैक्सीन के निर्माण के बाद टीकाकरण के दूसरे चरण में प्रवेश करना गर्व का विषय है। दूसरे चरण की शुरूआत में उपराष्ट्रपति वैंकेंया नायडू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह सहित कई दूसरे नेताओं व कई प्रतिष्ठित जनों ने कोरोना वैक्सीन की पहली डोज ली। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य सेवाएं बेहद सामान्य स्तर की समझी जाती हैं वहां कोरोना जैसी घातक बीमारी का टीका रिकॉर्ड टाइम में बनाकर करोड़ों की आबादी के लिए टीकाकरण अभियान चलाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इस कार्य को किसी भी स्तर पर मामूली नहीं माना जा सकता। देश में टीकाकरण अभियान के पहले चरण की शुरुआत इस वर्ष 16 जनवरी को हुई। प्रथम चरण में स्वास्थ्यकर्मियों यानी डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स और स्वास्थ्य से जुड़े लोगों को वैक्सीन दी गई थी। साथ ही फ्रंटटलाइन वर्कर्स यानी पुलिसकर्मियों, पैरामिलिट्री फोर्सेज और सैन्यकर्मियों को भी टीका लगाया गया। अभी तक भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना का टीका दिया जा चुका है, जिनमें स्वास्थ्यकर्मी और फ्रंटलाइन वर्कर्स शामिल हैं।

वो अलग बात है कि विपक्षी दलों और कई प्रबुद्धजनों ने वैक्सीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये और स्वदेशी वैक्सीन को बदनाम करने की कोशिश की। सबसे बड़ी बात ये हुई कि दुनिया के विकसित देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए भारत ने करोड़ों टीके न सिर्फ घरेलू उपयोग के लिए बना लिए अपितु उनके निर्यात की गुंजाइंश भी निकाल ली। जमीनी सच्चाई यह है कि दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश हमारी वैैक्सीन को खरीद रहे हैं। दुनिया के तमाम देशों में भारतीय वैक्सीन के बलबूते ही कोरोना महामारी से लड़ाई लड़ी जा रही है। हमारे देश में कोरोना को लेकर खूब राजनीति हो चुकी है और आगे भी होती रहेगी लेकिन उसका जो टीकाकरण अभियान शुरू हुआ है वह देश के लिए बड़ी उपलब्धि है।

दूसरे चरण में अब आम लोगों को वैक्सीन मिलेगी। सरकार का लक्ष्य जुलाई तक 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन देने का है। कोविड-19 टीकाकरण के दूसरे चरण में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को वैक्सीन लगेगी। इसके अलावा 45 साल से अधिक उम्र के उन लोगों को भी वैक्सीन दी जाएगी जो किसी न किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं। केंद्र सरकार के मुताबिक, दूसरे चरण में करीब 10 करोड़ लोग 60 साल से ज्यादा उम्र के हैं। अभी इस पर भी स्पष्टता आनी बाकी है कि 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में गंभीर बीमारिया। किसे माना जाएगा।

देश में हेल्थकेयर का खस्ताहाल ढांचा समस्या को और गंभीर बना रहा है। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक देश में केवल 23,582 सरकारी अस्पताल है जिनमें लगभग 7,10,761 बेड हैं, जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों के 2,79,588 बेड वाले 19,810 अस्पताल शामिल हैं। वहीं, शहरी क्षेत्रों में 4,31,173 बेड वाले 3,772 अस्पताल हैं। इसके अलावा 2,900 ब्लड बैंक है। हालत यह है कि देश में 10 लाख की आबादी पर मुश्किल से तीन ब्लड बैंक हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत की 70 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है, इसके बावजूद हर साल केवल 5500 डॉक्टर भर्ती हो पाते हैं। देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 50 फीसदी से भी ज्यादा कमी है। ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा 82 फीसदी तक पहुंच जाता है। भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी के मुकाबले अभी भी एक फीसदी के आसपास है। दूसरे विकसशील देशों की बराबरी के लिए हमें काफी कुछ करना होगा, जहां औसत खर्च लगभग दो से ढाई फीसदी है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयासों के बदौलत ही सीमित साधनों और संसाधनों के बावजूद कोरोना पर काफी हद तक प्रभावीरूप से काबू पाया जा सका।

मीडिया रिपोर्ट में ऐसा सामने आया है कि टीकाकरण को लेकर भी उदासीनता या लापरवाही दिखाई दे रही है। कोरोना का ये टीका दो चरणों में लगता है। पहले टीकाकरण के बाद एक निश्चित अवधि में उसकी दूसरी खुराक लेना अनिवार्य है अन्यथा वह प्रभावहीन हो जाएगा। इस संबंध में जो जानकारी मिल रही है वह चैंकाने वाली होने के साथ ही चिंता का कारण भी है। फ्रंट लाइन कोरोना कार्यकर्ताओं की सूची में जिन लोगों को शामिल किया गया था उनमें से बड़ी संख्या में ऐसे निकले जो तय तिथि पर टीका लगवाने आये ही नहीं। इनमें चिकित्सा क्षेत्र के भी काफी लोग थे। इसी तरह के उदाहरण अन्य वर्गों में भी देखने मिले। इन लोगों की गैर जिम्मेदारी समाज के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है इसका अंदाज लगाना कठिन नहीं है। विशेष रूप से जब कोरोना का संक्रमण तेजी से वापिस लौट रहा है।

बदलाव की रणनीति के तहत सरकारी अस्पतालों में मुफ्त टीका लगाने के साथ ही निजी अस्पतालों में निर्धारित राशि देकर टीकाकरण की पहल भी सार्थक है। इससे जहां टीकाकरण में गति आएगी, वहीं उन लोगों को सुविधा हो सकेगी जो लंबी कतारों से बचना चाहते हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों में टीकाकरण अभियान पर दबाव कम होगा, साथ ही सरकार के लिए मुफ्त टीका उपलब्ध कराने का खर्च भी घटेगा। इसके अलावा कम समय में अधिक लोगों को टीका लगाया जा सकेगा।  जो लोग सक्षम हैं उन्हें टीके का मूल्य चुकाना चाहिए। शासकीय केन्द्रों में निःशुल्क और निजी में सशुल्क टीकाकरण की व्यवस्था संतुलित सोच का अच्छा उदाहरण है। उसी के साथ ये भी जरूरी है कि टीके की अगली खुराक लेने के प्रति पूरी गम्भीरता एवं जिम्मेदारी रखी जाए क्योंकि उसके बिना पहली खुराक तो बेकार जायेगी ही कोई जरूरतमंद उससे वंचित रह जाएगा। कोरोना वैक्सीनेशन अभियान में प्राइवेट सेक्टर की बड़े पैमाने पर भागीदारी भी आवश्यक होगी क्योंकि आबादी का अधिक से अधिक वर्ग वैक्सीनेशल के लिए पात्र बन जाएगा। सरकार ने भी टीकाकरण की गति बढ़ाने के उपायों पर विचार कर रही है।

कोरोना ने बीते कुछ दिनों में जिस तरह से दोबारा दस्तक दी है उसे देखते हुए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग जल्दी से जल्दी टीका लगवाकर खुद भी सुरक्षित हों और दूसरों के लिए भी खतरा पैदा न करें। राजनीतिक दलों का भी ये फर्ज है कि वे जिस तरह अपने अभियानों के लिए जनता के बीच जाते हैं उसी तरह कोरोना टीकाकरण को लेकर जनता को जागरूक करते हुए टीका लगवाने प्रेरित करें। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि संक्रमण को रोकने के लिए कम से कम 65-70 प्रतिशत लोगों को वैक्सीन लगानी होगी, जिसका मतलब है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रेरित करना होगा। देश-दुनिया में जिस तरह कोरोना संक्रमण रह-रह कर सिर उठा रहा है और नये-नये स्ट्रेन सामने आ रहे हैं, उसे देखते हुए टीकाकरण ही अंतिम उपाय हो सकता है।

सरकारी मशीनरी में आई शिथिलता तथा आर्थिक बेचैनी के कारण, जनता यह नहीं चाहेगी कि फिर से लॉकडाउन जैसे उपाय थोपे जाएं। ऐसे में फिर से बचाव के मूल मंत्र अपनाने का सहयोग अगर जनता को दिखाना है, तो सरकार को भी नये सिरे से चैकसी और पहरेदारी बढ़ानी होगी। जब तक वैक्सीन के लक्ष्यों में अधिकतम आबादी सूत्रधार नहीं बनती, चहल-पहल की हर सतह पर शैतान कोरोना के कदम बिना सुराग के भी अनुभव करने होंगे। यकीन मानिए अगर कोरोना की नई लहर देश में फैलती है तो अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा नुकसान होगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कोविड-19 के खिलाफ पूरी दुनिया में पर्याप्त टीकाकरण करने में महीनों या संभवतः वर्षों का समय लग सकता है, जिसके बाद ही हम सामान्य स्थिति में लौट सकेंगे।

 

राजेश माहेश्वरी

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