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देश में हो बहु स्तरीय युवा आयोग

युवा भारत को बहुस्तरीय युवा आयोग की जरूरत 

भारत पूरे दुनिया में सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है।आने वाले कुछ महीनों में देशवासियों की औसत आयु 29 साल होने की संभावना के साथ भारत दुनिया का सबसे युवा देश बन बनने का गौरव हासिल कर लेगा। 18 से 35 वर्ष के लोगों को आमतौर पर युवा माना गया है। 2011 के जनगणना के अनुसार देश के कुल एक अरब 21 करोड़ जनसंख्या में से इस आयु वर्ग की जनसंख्या लगभग 37 करोड़ है जो कुल आबादी का 31.27 फीसद है।वहीं 2021-31 में 20 से 59 वर्ष के आयु वर्ग की कार्यकारी जनसंख्या लगभग 55 फीसद होगी।वर्ष 2021 से 31 के दौरान औसतन हर वर्ष 97 लाख रोजगार के नए अवसर सृजित करने होंगे। भारतीय जनसंख्या के इस सबसे बड़े समूह के सपने को पूरा करने के लिए देश में एक ऐसे ढांचा विकसित करने की जरूरत है जो युवाओं को सही समय पर उनके हुनर कौशल और योगिता के अनुसार काम और रोजगार प्रदान कर सकें।यह तभी संभव है जब देश में बहु स्तरीय यह था राष्ट्रीय राजकीय जिला एवं प्रखंड युवा आयोग जैसे युवाओं को समर्पित एक संस्था हो जो उनके भविष्य के लिए कार्य नीति तैयार करे और उसे लागू करने के लिए व्यापक ढांचा का विकास करे।
पिछले दशक से जिस प्रकार त्वरित गति से भारत में युवा जनसंख्या के अनुपात में रोजगार के अवसर उत्पन्न नहीं हो पा रहे हैं यह बहुत ही सोचनीय विषय है। अगर समय रहते इस पर नहीं सोचा गया तो देश के सबसे सकारात्मक ऊर्जावान लोगों के ऊर्जा का देश हित में करने से देश चुक जाएगा।यही नहीं देश के सामने यह मौका काफी लंबे समय तक नहीं रहने वाला है क्योंकि आने वाले वर्षों में देश के आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रौढ़ावस्था की ओर बढ़ जाएगा जो देश के विकास की रफ्तार को बिल्कुल थाम देगा।इसलिए वर्तमान ऊर्जावान उम्र समूह को रोजगार से हर हाल में जोड़ना होगा।उनके भविष्य के साथ ही देश का भविष्य जुड़ा हुआ है। अगर युवाओं का भविष्य अंधकार में हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया के बेरोजगारों की राजधानी के तमगा हासिल कर लेगा।
अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार भारत के जनसंख्या के स्वरूप में वर्तमान में जो परिवर्तन हो रहा है,उसको ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ यानी जनांकिक लाभांश कहा जाता है।संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की परिभाषा के अनुसार,इससे आर्थिक वृद्धि की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।हालांकि साढ़े तीन दशकों तक युवाओं की संख्या कार्यबल में जुड़ती रहेगी,लेकिन देश के सामने 2035 तक ही यह सुनहरा अवसर है,क्योंकि उसके बाद से आबादी की औसत उम्र बढ़ने की गति तेज होने लगेगी।चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की सफलता में कामकाजी लोगों की जनसंख्या का अधिक होना बहुत सहायक रहा है।इतनी बड़ी आबादी के लिए काम और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना किसी भी देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती है और अगर प्राथमिकता के साथ इस चुनौती का सामना नहीं किया जाए,तो यही जनसंख्या लाभ के जगह कई समस्याओं का कारण बन जाता है।शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार की समुचित व्यवस्था किये बिना विकास प्रक्रिया में युवाओं का समुचित उपयोग संभव नहीं है।लगातार सुधारों के बावजूद हमारे प्रशासनिक ढांचे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा,स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तंत्र की गुणवत्ता निराशाजनक ही नहीं सवाल के घेरे में बना हुआ है।तकनीक और वित्तीय सेवाओं की पहुंच आम लोगों के बीच आज भी बहुत सीमित है।कुपोषण,निर्धनता, संस्थानिक भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से सही तरीके से नहीं निपटा जा सका है।देशवासियों के सामने रोजगार की कमी तो है ही,शिक्षित युवाओं के बड़े हिस्से के पास पूर्ण कौशल और दक्षता का अभाव व्याप्त है। अर्थव्यवस्था की गिरावट का नकारात्मक असर आमदनी, रोजगार,बचत और उपभोग पर सीधे-सीधे पड़ रहा है।सरकारी खर्च के अलावा कुल घरेलू उत्पादन के अन्य आधारों- निजी उपभोग खर्च,निवेश और निर्यात- की स्थिति लगातार चिंताजनक हालत में बना हुआ है।इन परिस्थितियों में सरकारों तथा औद्योगिक समूहों को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक नीतियां व कार्यक्रम बनाना चाहिए। संस्थानिक और वित्तीय सुधारों को तेज करने के साथ अर्थव्यवस्था को निराशाजनक दौर से उबारने के लिए हो रहे उपायों को स-समय अमली जामा पहनाने पर जोर दिए जाने की जरूरत है।
देश वासियों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्पष्ट कार्यनीति तैयार हो जिससे भारत के भविष्य नवजात शिशुओं और बच्चों को स्वस्थ, सक्षम और कुशल बनाया जाए।स्वास्थ्य बीमा,टीकाकरण, चिकित्सा केंद्रों की संख्या बढ़ाने,ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल उपलब्धता और स्वच्छता को प्राथमिकता देने जैसे सरकारी प्रयासों से भविष्य के लिए उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।इसी तरह की कोशिशें शिक्षा के लिए देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान प्रति दस लाख जनसंख्या पर स्थापित किया जाना चाहिए एवं प्रत्येक 50 लाख जनसंख्या पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक एवं शोध संस्थान स्थापित किया जाना चाहिए। सर्वप्रथम प्रत्येक राज्य में हर क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिक एवं शोध संस्थान हर हालत में स्थापित होने चाहिए।देश में अकुशल और अर्ध कुशल लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।पर्यावरण के संकट का भी संज्ञान लेना जरूरी है।यदि जनांकिक लाभांश के इस मौके को हमने खो दिया,तो विकास और समृद्धि के हमारे सपनों को साकार होने में बहुत लंबा समय लग जायेगा।
अगर हम देश के युवाओं के बीच बेरोजगारी मोर्चे पर बात करें तो पिछले वर्ष सितंबर से दिसंबर 2019 के चार महीनों में बेरोजगारी की दर 7.5 फीसदी तक पहुंच गई है।यही नहीं, उच्च श‍िक्ष‍ित लोगों की बेरोजगारी दर बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच गई है।ग्रामीण भारत की तुलना में शहरी भारत में बेरोजगारी की दर ज्यादा है।रिपोर्ट के अनुसार, 20 से 29 साल के ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी की दर 42.8 पहुंच गई है जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। वहीं, सभी उम्र के ग्रेजुएट के लिए औसत बेरोजगारी दर 18.5 फीसदी पर पहुंच गई जो इसका उच्चतम स्तर है।इसी तरह का हाल पोस्ट-ग्रेजुएट के लिए भी है।कॉलेज से निकलर जॉब मार्केट में आने वाले युवओं की स्थिति भी बेहतर नहीं है। 20 से 24 साल के उम्र के युवओं के बीच सितंबर से दिसंबर के दौरान बेरोजगारी की दर दोगुनी होकर 37 फीसदी पर पहुंच गई है।
इतनी बड़ी बेरोजगार युवा जनसंख्या को देश हित में सही तरीके से उपयोग करने के लिए हर हाल में राष्ट्रीय युवा आयोग जैसे संस्थान की जरूरत है।जो युवाओं के हित और जरूरतों को पहचान कर कोई निर्णय ले सके। देश के प्रत्येक जिलों में फिर से नियोजनालय को कार्यरत बनाया जाना चाहिए।जहां युवा रोजगार के लिए अर्जी दे सके।इससे देश को पता चलेगा वास्तव में रोजगार खोजने वाले युवाओं की कुल जनसंख्या कितनी है। वे किस प्रकार के रोजगार ढूंढ रहे हैं उनके पास कैसी योग्यता और क्षमता है।अगर देश को यह सब मालूम चल जाएगा तो उनके लिए बेहतर नीति बनाया जा सकेगा।
युवा जनसंख्या को समय पर अगर नहीं संभाला गया तो जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में देश के कोने कोने से युवाओं के द्वारा गलत राह पर पैर रखने की खबर मिलती रहती है वह बढ़ने की आशंका है।युवा रोजगार न मिलने के कारण कुंठा के शिकार होते हैं और गलत निर्णय लेने को मजबूर हो जाते हैं उन्हें पता नहीं चलता क्या सही और क्या गलत है।उन्हें चौतरफा आलोचना का शिकार होना पड़ता है।जिससे वे विचलित हो जाते हैं।एक तरफ उनके पास रोजगार नहीं होता दूसरी ओर उनकी जरूरतें और जिम्मेदारियां दिनोंदिन बढ़ती जाती है जिसे वे पूरा करने में नाकाम होते हैं।यही नहीं घर परिवार समाज हर लोग की उम्मीद पर खरा उतरना युवाओं के लिए मुश्किल हो जाता है।देश में घटित होने वाले अपराधों का अगर विश्लेषण किया जाए तो 80 फ़ीसदी से अधिक नौजवान ही इसमें शामिल होते हैं जिनके पास कोई काम धंधा नहीं है।लड़ाई झगड़ा दंगा फसाद करने वाले लोग अधिकतर इसी आयु वर्ग के वे लोग होते हैं। खाली मन शैतान का मुहावरा इन के लिए बिल्कुल सच साबित होता है।बिना काम धंधा के खाली इधर उधर टहलते रहते हैं इसलिए वे किसी के बहकावे में आकर अपने भविष्य को बर्बाद कर लेते हैं।पिछले दिनों दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों में मारे गए लोगों में से अधिकतर इसी आयु वर्ग के लोग थे।सही मार्गदर्शन के अभाव में है विश्वविद्यालय से निकलने वाले युवा पीढ़ी भी सड़कों पर नारे लगाने लगते हैं जिन्हें देश के भविष्य के लिए काम करना चाहिए वह देश तोड़ने की बात करने लगते हैं।राजनीतिक रैलियों में पहुंचने वाले भीड़ का सबसे बड़ा हिस्सा यही बेरोजगार युवा होते हैं जिसका लाभ देश के राजनीतिक लोग उठाते हैं पर उन्हें उसके बदले उनके हाथों में झंडा और डंडा एवं दिमाग में नफरत और अवसाद के सिवा कुछ नहीं मिलता।
हर हाल में युवा जनसंख्या को भारत के नव निर्माण में योगदान देने लायक बनाना होगा।अगर इसके लिए राष्ट्रीय स्तर,राज्य स्तर,जिला स्तर एवं प्रखंड स्तर पर युवा आयोग का गठन किया जाए तो युवाओं के साथ-साथ देश को भी बहुत लाभ होगा।

गोपेंद्र कुमार गौतम
सामाजिक और राजनीतिक चिंतक
देवदत्त पुर पोस्ट एकौनी दाउदनगर औरंगाबाद बिहार 8241 13
व्हाट्सएप 950 734 1433

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