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सोचिए जब आइना ही झूठ दिखाए तो आप क्या करेंगे?

प्रेस किसी भी देश व समाज का आईना होता है, प्रेस की आजादी से यह बात साबित होती है कि उस देश में अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता है, हमारे भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक जरूरत है,हमारे यहां मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी माना गया है, साथी प्रेस और मीडिया हमारे आसपास घटित होने वाली घटनाओं से हमें अवगत करवा कर हम सभी के  लिए खबर वाहक का काम करती हैं, यही खबरें हमें दुनिया से जोड़े रखती हैं। हमारे भारत में अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चर्चा होती रहती है, 3 मई को मनाए जाने वाले विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत में भी प्रेस की स्वतंत्रता पर बातचीत करके हमे जागरूकता लानी होगी । जैसा कि हम सभी जानते ही है की भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित की जाती है। वही विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया, जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी हम मनाते  है। लेकिन मेरे आत्मीय साथियों आज अधिकतर मीडिया को जनता के दर्द से ज्यादा सेलिब्रेटीज लोगों की दिनचर्या में ज्यादा मजा आता है, इस कोरोना काल में भी हम देख सकते हैं कि आम आदमी अगर कोरोना से जान गवां दे तो हेडलाइन बडी मुश्किल से बनेगी वही कोई वीआईपी  हो तो फिर देखो ,या कहे की आज के  समाचार बुलटिनों में किसी किसान , गरीब की खबर हो या न हो लेकिन किसी अभिनेत्री ने क्या खाया, क्या पहना यह जरुर होगा,  देश का एक बड़ा हिस्सा कोरोना के आग में जल रहा है , लेकिन समाचारों की हेडलाइन होती है कलाकारों की निजी जिंदगी. छद्म पत्रकारिता के आवेश में सही-गलत सब मिश्रित हो जाता है, स्टिंग ऑपरेशनों में जो हकीकत होती है उसकी सच्चाई पर भी हमेशा सवालिया निशान रहते हैं, इसके साथ ही मीडिया में बढ़ती अश्लीलता भी एक गंभीर मुद्दा है, वही दुसरी तरफ बड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों के लिए यूएपीए का इस्तेमाल होता है लेकिन छोटे ज़िलों में बिना किसी सपोर्ट सिस्टम के काम करने वाले पत्रकार कलेक्टर के एक नोटिस या कई बार तो सिर्फ़ 144 तोड़ने के आरोप में ही जेल के अंदर भर दिए जाते हैं, बड़े शिकार के लिए बड़ा हथियार और छोटे शिकार के लिए छोटा. एक पर यूएपीए लगाया बाक़ी केb अपने आप शांत हो जाएँगे,इस महामारी की आड़ में विरोधी स्वर दबाए भी जा रहे है ,आखिर पत्रकारों के लिए कब सुरक्षा कानून बनाया जायेगा ? देखे तो 19 शताब्दी के शुरुआत से मीडिया के बढ़ते प्रभाव और संभावना को देखते हुए उसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रुप में देखा जाने लगा है ,समय के साथ मीडिया का दायित्व भी बढ़ता गया है ,अब मीडिया सिर्फ समाचार दिखाने का जरिया नहीं बल्कि समाज में जागरुकता फैलाने का एक मंच बन गया, साथ ही मीडिया समाज का ऐसा दर्पण होता है, जो समाज व राष्ट्र को उसकी सच्चाई दिखाता है,  लेकिन आज  बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा और बाजारीकरण के दौर में मीडिया का रंग काफी कुछ बदलता जा रहा ,अब समाज को आइना दिखाने वाला मीडिया खुद ही कई चीजें छुपाने लगा है,सोचिए जब आइना ही झूठ दिखाए तो आप क्या करेंगे? समाज के धनाढ़्य और उच्च वर्गीय लोगों ने मीडिया के हर रुप पर अपनी पकड़ बना ली। देखे तो पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया और ऑडियो मीडिया हुआ करती थी, पर समय के साथ जैसे ही नेताओं और बिजनेसमैनों ने मीडिया के इन प्रारुपों में अपनी पकड़ जमाई, मीडिया अपने सामाजिक दायित्व को भूलती गई और अपने हित को सर्वोपरि मानने लगी है ,  आजादी के समय जिस मीडिया ने समाज में जागरुकता फैलाने का काम किया था उसी मीडिया के इतने बुरे दिन आ गए कि टीआरपी के चक्कर में उन्होंने समाज में अंधविश्वास फैलाना शुरु कर दिया ।
 विक्रम चौरसिया
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