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विचारक (लघुकथा)

मेरे एक परिचय के अंकल जी पक्के बौद्धिस्ट और वामपंथी विचारक थे। मंच से उनके ओजस्वी भाषणों से मैं काफी प्रभावित था। समय-समय पर फोन से उनसे बात करके बहुत उत्साहित होता रहता था, एक दिन मैंने उनसे कहा-अंकल जी आप के सोशल वर्क से मैं काफी प्रभावित हूँ। मैं मरने के बाद अपनी आंखें दान करना चाहता हूं, पर दान करने की कोई सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। क्या आप को पता है ? आप तो बुजुर्ग हो रहें हैं, आप भला नेक काम में कब पीछे रहतें हैं, मेरा ख्याल है, आप ने तो बहुत पहले अपनी आंखें दान कर दीं ही होंगी।
वे लरजते शब्दों में बोले-मुझे तो सारी औपचारिकताएं पता हैं,पर जब-जब मैंने आंखें दान करने की सोची या कोई न कोई प्रयास किया, तब-तब मेरे साथ कोई न कोई अपशगुन होने लगा, कभी मैं बीमार पड़ गया, कभी मेरी पत्नी। इस वजह से यह कार्य टलता चला गया।
मैंने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा-अच्छा ऐसा हुआ।
आज मुझे मालूम हो चुका था कि अंकल जी कितने बड़े वामपंथी और किस बौद्धिक स्तर के विचारक हैं।

(सुरेश सौरभ)

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