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तारीफों के पुल बांधने का वक्त!

आज मन कर रहा है कि मैं तारीफों के पुल बांध दूं। बहुत दिन हो गए किसी की तारीफों के पुल नहीं बांधे! अब वक्त आ गया है तारीफों के पुल बांधने का! इसके लिए वाह-वाह, जोरदार, आप जैसा कोई नहीं, दुनिया में आप ही एकमात्र महान हो जैसे सीमेंट, सरिया, बजरी और गिट्टी का इंतजाम करने लग गया हूं। दुनिया में आप ही एक मात्र महान हो जैसी बजरी नहीं मिल रही है, लेकिन नकली महानता वाली बजरी का इंतजाम कर इसे असली बजरी में मिला रहा हूं। वाह-वाह की सीमेंट बहुत महंगी है फिर भी इंतजाम कर रहा हूं। आप जैसा कोई नहीं; जैसे सरिए का भी यही हाल है, लेकिन पुल बनाना जरूरी है। जैसे-तैसे ये सब ईंट-रोड़ा, भच-भचाता फोड़ा इकट्ठा कर लिया है। कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने तारीफ पुल जोड़ा। बस इसी भानुमति सिद्धांत पर चलने का मन बना रखा है। एक ही पार्टीखोर अपने आलाकमान की तारीफों के पुल जिस तरह से बनाता है, इससे अच्छा खासा दलाल-चमचा भी ठगा सा रह जाता है। एक नया-नया इश्कखोर भी ऐसी तारीफों के पुलों के आगे अपनी प्रेमिका के सामने लाचार, हताश और निराश हो जाता है। वैसे तारीफों के पुल बांधने का समस्त ठेका चमचों के नाम छूटा हुआ है। अगर मेरा जैसा काइयां बंदा भी तारीफों के पुल बांधने लग जाए, तो इससे चमचागिरी के महल में सेंधमारी ही माना जाएगा। तारीफों के पुल बांधने की समस्त पूर्व तैयारी कर ली है। लेकिन अभी तक यह समझ में नहीं आ रहा है कि मैं पुल किसकी तारीफ में बनाऊं? तारीफ करने का मन कर रहा है। जी मचल रहा है। मारे तारीफ के जुबान मुंह में कथकली कर रही है। दांत आपस में भांगड़ा नृत्य करने के लिए उछल कूद मचा रहे हैं।
तेरे दांत अनार जैसे दाने वाले। आंखें मद से भरे प्याले। होट रेशमिया सी डोर से। मुखड़ा चांद का टुकड़ा; जैसी तारीफों के पुल बांध-बांध कर कितनी ही सूर्पनखाओं को लाला छत्तूमल मट्टूलाल हलवाई ने बेवकूफ बनाया है। तारीफों का यह कारोबार बरसों से लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए किया जा रहा है। गली के नेता नत्थूलाल छेदामल को सीएम बनने के लिए परम योग्यता धारी बताकर अच्छे-अच्छे चमचों ने भगौनी में खूब शोर मचाया है। कड़ाही में डांस फरमाया है। उजबक से दिखने वाले बॉस की तारीफों के पुल बांधकर जाने कितने वर्षों से जाने कौन-कौन से सयाने जंतु अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। वैसे समस्त तारीफों के पुल का मूल स्रोत अपना उल्लू सीधा करना ही रहा है। इसके साथ ही तारीफों के पुल बांधने के कार्य में दूसरों लोगों का उल्लू टेढ़ा करने की चाल भी सदियों से चली आ रही है। कहीं भी हो, कैसे भी हो; अगर तारीफ कर दी जाए तो, जातक का उल्लू सीधा हो जाता है। देश के समस्त पति अपनी पत्नियों की तारीफ इस कदर से करते हैं कि उनका उल्लू तुरंत ही सीधा हो जाता है। कई-कई पत्नियां तो अपने कान सिर्फ तारीफ सुनने के लिए ही खुले रखती हैं और निखट्टू चालबाज पति लोग इसी बात का फायदा उठा जाते हैं। अच्छी-खासी हथिनी को मृगनैनी कहकर अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं। इन सब बातों का ध्यान रखकर मेरा भी मन तारीफ करने के लिए मचल रहा है।

 

रामविलास जांगिड़

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