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उत्तर से दक्षिण तक क्षेत्रीय दलों के टॉनिक

जीत के बाद दिल्लीवासियों को सपोर्ट के लिए आई लव यू कहने वाले केजरीवाल वैकल्पिक राजनीति का नारा दे कर मैदान मे उतरे थे।पांच साल के उनके काम ने दिल्ली मे विकास की राजनीति का नया नारा दिया।केजरीवाल इसे फक्र से बोलते भी हैं कि नई राजनीति का जन्म हुआ है,जिसे काम की राजनीति कहते हैं और यही देश को आगे ले जाएगी।दिल्ली के नतीजों को देख कर केजरीवाल की इस बात मे दम लगता है।लोकसभा चुनाव के बाद हुए तीन अन्य राज्यों के चुनावी नतीजे भी यही बताते हैं कि धुर्वीकरण या उकसावे वाली राजनीति से चुनावी ट्रैक पर मैराथन दौड़ नही जीती जा सकती है।लेकिन इधर सरकार के आकार लेने के बाद आम आदमी पार्टी को अब राम भक्त हनुमान याद आ रहे हैं।केजरीवाल ने बोला भी था कि दिल्ली पर हनुमानजी ने कृपा बरसाई।पार्टी प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने ट्विटर पर लिखा है कि हर महीने के पहले मंगलवार को सुंदर कांड का पाठ अलग अलग इलाकों में किया जाएगा।वह कहते हैं कि जब जब हमारे ऊपर और दिल्ली की जनता के ऊपर संकट आए,संकट मोचन की तरह हनुमान जी ने हमें बाहर निकाला।पिछले दो शपथग्रहण मे केजरीवाल की पहचान मफलरमैन की थी,लेकिन इस बार वह माथे पर मंगल का तिलक लगा कर हनुमान भक्त के रूप मे शपथ ग्रहण करने रामलीला मैदान पंहुचे थे।ये संकेत है कि आम आदमी पार्टी आने वाले दिनों मे दिल्ली से बाहर निकल कर दिल्ली जैसी मजबूती के साथ राजनीतिक चाल चलेगी।यानी वह राम भक्त भाजपा का मुकाबला हनुमान भक्त बन कर करेगी।सेक्यूलर छवि पर आंच न आये इस लिए उसने पहले ही मस्जिद के इमामों और मोअज्जिन का वेतन बढ़ा दिया है।यहां ये कहने मे कोई संदेह नही है कि दिल्ली से निकले संदेश बिहार और बंगाल मे भी भाजपा की दिक्कतें बढ़ायेगें।वहीं दक्षिण की राजनीति मे भी दिल्ली के केजरीवाल माडल की गूंज सुनाई पड़ रही है।इसमे कोई शक नही की केजरीवाल की जीत ने क्षेत्रीय पार्टियों के आत्मविश्वास को नई मजबूती दे दी है,इससे दक्षिण में भाजपा के मनसूबों को धक्का लगा है।

तमिलनाडु में कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानने लगे हैं कि कमल हासन को केजरीवाल मॉडल अपना कर आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए,साथ मे हिंदुत्व की राजनीति से जुड़े मुद्दों को भी समझना चाहिए।उल्लेखनीय है कि हासन मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं।वहीं कुछ विश्लेषक सुपरस्टार रजनीकांत को केजरीवाल मॉडल के ज्यादा मुफीद बता रहे हैं। कमल हासन के उलट रजनीकांत मोदी सरकार की अनेक नीतियों के मुखर समर्थक रहे हैं।उन्होंने सीएए और एनआरसी का समर्थन करते हुए उसके पक्ष मे कई, दलीलें भी दी हैं।वैसे रजनीकांत ने अभी तक अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन नही किया है,लेकिन दक्षिण की राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि वह अलग तरह के राजनीतिक ब्रांड वहां बन सकते हैं।काबिलेगौर है कि तमिलनाडु में धर्म से अधिक जाति मायने रखती है,क्योंकि वहां धार्मिक धु्रवीकरण का असर न्यूनतम रहा है।एक बात तो तय है कि दिल्ली में भाजपा की पराजय ने बिहार,पश्चिम बंगाल,उततर प्रदेश एवं दक्षिण भारत मे क्षेत्रीय पार्टियों को एक नई ताकत दी है।क्षेत्रीय पार्टीयों पर नजर रखने वाले जानकार कहते हैं कि अब वह इस हैसियत में होंगी कि अपनी शर्तें रख पाएं,बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का रूप तय करने की सोचने लगें।जैसे कि रामविलास पासवान की लोजपा के चिराग पासवान ने साफ कर दिया है कि बिहार मे भाजपा नेताओं को दिल्ली वाले बयानों से परहेज करना होगा।ऐसा लगता है कि भाजपा आलाकमान को ये बात समझ मे भी आ गयी और उसने कड़ुवे बोल मे माहिर गिरिराज सिंह जैसों को नसीहत दे डाली।वहीं तेलंगाना के टीआरएस सुप्रीमो चंद्रशेखर राव एक बार फिर राज्यों के अधिकारों की बात उठा रहे हैं।केसीआर ने एलान किया है कि वह नागरिकता संशोधन कानून पर रणनीति बनाने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों की एक बैठक बुलाएंगे।तेलंगाना के मुख्यमंत्री कुल राजस्व में राज्यों के हिस्से का मसला भी उठा रहे हैं।उधर दिल्ली में भाजपा का जनाधार सिमटने से आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस के साथ उसके गठजोड़ के गणित को गड़बड़ा दिया है।एनडीए में शामिल होने की किसी भी कोशिश पर वाईएसआर के एक उपमुख्यमंत्री ने पार्टी तक छोड़ने की धमकी तक दे डाली है।बिहार में इसी साल के आख़िरी महीनों में और पश्चिम बंगाल में अगले साल के मध्य में विधान सभा चुनाव होने हैं।दोनों ही प्रदेशों में स्थानीय पार्टियों का बड़ा मुक़ाबला बीजेपी से होना तय है।माना जा रहा है कि दिल्ली में केजरीवाल की जीत का असर इन दोनों प्रदेशों के चुनावों पर भी होगा।यही नही दिल्ली के चुनावी नतीजे ने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में राज्य के सत्ताधारी गठबंधन की चिंता बढ़ा देने संबंधी कई इशारे दिए हैं।कागबिलेगौर है कि दिल्ली चुनाव में बिहार के कई नेताओं ने भी अपना परचम लहराया है,खास तौर पर राज्य के मिथिलांचल क्षेत्र से आने वाले नेताओं ने अपना जलवा दिखाया है।आम आदमी पार्टी के संजीव झा ने बुराड़ी से और किराड़ी विधानसभा क्षेत्र से रितुराज झा ने जीत दर्ज की है।बिहार के ही राजेश ऋषि ने विकासपुरी,शालीमार बाग से वंदना कुमारी,द्वारका से विजय मिश्र ने आप के टिकट पर जीत दर्ज की।ये तब हुआ जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जेडीयू ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा और नीतीश ने खुद भी बिहारी मतदाताओं वाले क्षेत्रों में बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार किया था।बिहार में बीजेपी की योजना सहयोगी जेडीयू के बराबर सीट हासिल करने की थी।लेकिन दिल्ली के चुनावी नतीजे ने बीजेपी को उलझा दिया है।बीते 14 महीनों में बीजेपी की यह सातवीं हार है।इसके साथ ही पांच राज्यों में उसे अपनी सत्ता भी खोनी पड़ी है।बिहार में बीजेपी के पास कद्दावर नेता न होने के साथ ही विधानसभा चुनावों में लगातार हार के बाद वह दबाव में होगी और नीतीश से बहुत अधिक मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होगी।अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पाँच साल से चल रही दिल्ली सरकार ने शिक्षा,स्वास्थ्य और बिजली से जुड़े मुद्दों पर जैसा काम कर के दिखा दिया,वैसा नीतीश सरकार चौदह वर्षों में भी नहीं कर पायी बिहार में प्राथमिक शिक्षा से ले कर उच्च शिक्षा तक की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है। सरकारी स्कूल कंगाल और प्राइवेट स्कूल मालामाल नज़र आते हैं।हालात ये हैं कि कई बार शिक्षकों को समय से वेतन तक नही मिल पाता है।सरकारी अस्पतालों का तो और भी बुरा हाल है।जन-सुविधाओं के मामले में राज्य के सारे शहरों या क़स्बों की स्थिति नारकीय बनी हुई है।बीती बारिश मे बिहार से आयी तस्वीरों ने सारी कहानी कह दी है।आम जनता की ज़रूरतों से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर भावनात्मक मुद्दों को हावी नहीं होने देने वाले इस चुनावी नतीजे से नीतीश सरकार सोच मे जरूर पड़ गयी होगी।नीतीश की जेडीयू को दिल्ली मे हार का भी सामना करना पड़ा है।यही कारण है कि केजरीवाल की बड़ी जीत पर नीतीश कुमार अपनी पहली प्रतिक्रिया में सिर्फ़ इतना ही कह पाए थे कि जनता ही मालिक है।सुशासन बाबू की मायूसी भरी ये प्रतिक्रिया बता रही है कि पराजय की यह गूँज आठ-नौ महीने बाद बिहार में होने वाले चुनाव तक बीजेपी-जेडीयू का पीछा नहीं छोड़ेगी।बिहार के मौजूदा विपक्षी गठबंधन पर भी इन नतीजों का असर पड़ेगा।बिखरे हुए और बाब-बात पर लड़ने वाले महागठबंधन के दलों मे एकजुटता की ललक पैदा हो सकती है।बहुत सम्भव है कि बिहार के मुसलमानों ने भी दिल्ली से सबक लिया होगा और वह वोटों के बटवारे को रोकने वाली रणनीति अपना सकता है।भजपा पश्चिम बंगाल की गद्दी पर भी काबिज होने का सपना देख रही है।बंगाल भाजपा के लिए साख और नाक दोनो है।लेकिन यहां विधानसभा चुनावों के पहले अभी दो महीने बाद कोलकाता नगर निगम के अलावा सौ से ज्यादा स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं।पश्चिम बंगाल मे कोलकाता नगर निगम को मिनी विधानसभा चुनाव कहा जाता है।इसी मुकाबले मे दोनो दलों की रणनीति साफ हो जायेगी।बीते लोकसभा चुनावों मे भाजपा ने पश्चिम बंगाल मे जिस तरह से अपनी सीटों की तादाद दो से 18 तक पहुंचाई है,वह बंगाल मे उसकी बढ़ती ताकत जानने के लिए काफी है।जमीनी हकीकत मे भी ये दिखता है कि दक्षिण बंगाल मे हाल के वर्षो मे भाजपा काफी मजबूत हुयी है और उसने समय- समय पर दीदी को कड़ी चुनौती भी दी है।दिल्ली के मतदाताओं ने धार्मिक या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से अलग हट कर अपना जनादेश दिया है।भाजपा ने अपनी अधिक उर्जा दिल्लीवासियों को उग्रराष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने और शाहीनबाग की बिरयानी से हिंदुतत्व को खतरा बताने मे खर्च कर दी।इस नकारात्मक राजनीति का नतीजा सब के सामने है।दिल्ली के मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोने बता दिया कि उनके लिए शांतिपूर्ण,खुशगवार माहौल वाला देश जरूरी है और वह एक ऐसी सरकार चाहतें हैं कि जो बिजली,पानी,महिलाओं के लिए आसान सफर,सुरक्षा और उनकी सेहत की बात करती हो।अब भले ही कुछ लोग दिल्ली वालों पर मुफ्तखोर जैसा घटिया इल्जाम लगायें,लेकिन उनको ये नही भूलना चाहिए कि भारत मे अब भी लोकतंत्र मजबूत है।जो नेता जमीन से जुड़ा दिखाई देगा जनता उसको सिर माथे पर बिठाएगी।दिल्ली की जनता ने साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण और नफरत की राजनीति को परास्त कर ये संदेश दे दिया है कि जनता को पेट की भूख भी सताती है और जरूरतें भी महसूस होती है।इस लिए नफ़रत,घृणा और जुमलेबाजी से इतर राजनीति को वास्तविक विकास की ओर लौटना ही होगा।लेखक और विचारक डाक्टर सेवाराम त्रिपाठी कहते हैं कि जनतंत्र की भयावहता के बीच दिल्ली के लोगों ने काम करने वालों को तरजीह दी।झांसा पट्टी नही बेहतर भविष्य को नए सिरे से आगाज़ दिया है।रिटायर्ड सरकारी अधिकारी डीएन सिंह कहते हैं कि विकास की राजनीति से भारत,भारत बना है,इस लिए मौजूदा राजनीति के नामचीन चेहरों को भी विकास की पटरी पर उतरना होगा। लेकिन इधर सरकार के आकार लेने के बाद आम आदमी पार्टी को अब राम भक्त हनुमान याद आ रहे हैं।तो क्या ये माना जाये कि ये एक संकेत है?यानी आने वाले कल मे केजरीवाल की आम आदमी पार्टी कमसकम उत्तर भारत मे अपना फैलाव करेगी और राम भक्त भाजपा का मुकाबला हनुमान भक्त बन कर करेूगी। बहरहाल चाहे कुछ भी हो ये तय है कि केजरीवाल,आप और दिल्ली आने वाले कल मे देश मे मतदाताओं और राजनीतिक दलों का नज़रिया बदलने का ज़रिया तो बनेगें!

शाहिद नकवी

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