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परम्परागत बाइपास तकनीक से बेहतर हुआ दिल की बीमारियों का इलाज

विजय न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। बदलती जीवनशैली के साथ लोग अक्सर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। परिणाम स्वरूप पिछले एक दशक में मध्यम आयु वर्ग की आबादी के बीच विभिन्न प्रकार की बीमारियां बढ़ गई हैं। डायबीटीज, उच्च रक्तचाप और मोटापा कुछ ऐसी बीमारियां हैं जो हृदय रोगों के खतरे को बढ़ाती हैं। पिछले एक दशक में, न सिर्फ इन बीमारियों की संख्या दोगुनी हो गई है, बल्कि ये युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही हैं। 1.7 करोड़ के साथ हर साल मरने वालों की लिस्ट में दिल की बीमारी से मरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। लगभग 3.2 करोड़ भारतीय किसी न किसी प्रकार की दिल की बीमारी से परेशान रहते हैं जबकी हर साल इनमें से केवल 1.5 लाख लोग बाइपास सर्जरी करवाते हैं। नई दिल्ली स्थित साओल हार्ट सेंटर के निदेशक डॉ. बिमल छाजेड़ ने बताया कि, “आज कम उम्र के ज्यादा से ज्यादा लोग दिल की बीमारी की चपेट में आ रहे हैं, जिसका कारण केवल तनाव नहीं है। इसके कई कारण हैं जैसे कि प्रदूषण, धूम्रपान, खराब डाइट, सोने की गलत आदत आदि। भारत के लोगों की ये आदतें उनमें दिल की बीमारी का खतरा बढ़ाती हैं। दरअसल, भारतीयों में दिल की बीमारी का खतरा अन्य देशों की तुलना में ज्यादा होता है। उनमें पेट और पीठ का मोटापा भी एक आम समस्या के रूप में देखा जाता है। यह मोटापा उन्हें कोरोनरी आर्टरी डिजीज या हार्ट अटैक के करीब लेकर जाता है।”
दिल की बीमारी के इलाज के लिए अक्सर लोग बाइपास सर्जरी और एंजियोप्लास्टी का विकल्प चुनते हैं, लेकिन कई बार ये इलाज में विफल पाए गए हैं। बाइपास के इलाज के बाद व्यक्ति को फिर से बीमारी हो सकती है, इसलिए कई मरीजों के लए यह सही विकल्प नहीं है। वहीं नॉन इनवेसिव इलाज जैसे कि एक्सटर्नल काउंटर पल्सेशन (ईसीपी) एक ऐसा विकल्प है, जो ऐसे मरीजों के लिए एक बेहतर और सुरक्षित इलाज है।
डॉ. बिमल छाजेड़ ने आगे बताया कि, “ईसीपी, जिसे प्राकृतिक बाइपास तकनीक के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसी प्रक्रिया है जो बाइपास या स्टेम सेल थेरेपी की तरह ही शरीर को नई रक्त वाहिकाओं को बढ़ाने के लिए सक्षम बनाती है। इसकी मदद से मरीज जल्दी और देर तक चल सकते हैं। मरीजों का जीवन बेहतर हो जाता है, जबकी टेस्ट की मदद से दिल के स्वास्थ्य का पता चलता रहता है। पारंपरिक सीएबीजी (कोरोनरी आर्टरी बाइपास ग्राफ्टिंग) में ब्रेस्टबोन को 10 इंच लंबे चीरे से अलग किया जाता है। वहीं इसकी तुलना में प्राकृतिक बाइपास तकनीक पूरी तरह नॉन इनवेसिव है, जिसमें मरीज को दर्द न के बराबर होता है और शरीर पर कोई घाव के कोई निशान भी नहीं रहते हैं। इसमें मरीज को किसी प्रकार के संक्रमण का कोई खतरा नहीं रहता और उसे अस्पताल में ज्यादा दिन रहना भी नहीं पड़ता है। इसका फायदा 3 साल से 9 साल तक मिलता है। साओल (साइंस एंड आर्ट ऑफ लिविंग) पिछले 25 सालों से दिल के मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज करता आ रहा है।”

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