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दो अक्षरों का सवाल

वह मलीन बस्ती है। रेतीले पैर नमकीली चमड़ी वाले चेहरों पर हल्की मुस्कान के सिवाय कुछ नहीं है। उनके पास न शहर की चकाचौंध है न बनावटी रिश्ते। न दिखावा है न गिरते मूल्यों की सड़ांध। जो कुछ है सब उनकी कुटिया है। उनके पास कहने को रुपया-पैसा बिल्कुल नहीं है। इसके लिए न उन्हें स्विज बैंक की जरूरत पड़ती है न बिनामी लोगों की। अपने नाम से जीते हैं और अपने नाम से मरते हैं। गरीबी की पहचान को सीने से लगाए जिंदगी भर तिल-तिलकर जीते हैं। इनका जो कुछ है वह सब कुछ समुद्र है। इनके सारे रिश्ते नाते समुद्र से होते हैं। यहीं जीते और यहीं मरते हैं।
ऐसे ही किसी समुद्री तट वाली बस्ती में एक छोटे से नाले का मुँह बंद करने के लिए गीले सिमेंट का लेप बनाया जा रहा है। एक सात साल की लड़की तख्ती लेकर वहीं बैठी है। वह लकड़ी की तिलिया लेकर गीले सिमेंट पर कुछ लिखकर चली गयी। मानो किसी यक्ष ने कोई प्रश्न लिख दिया हो। क्या लिखा होगा उस पर?! दो अक्षरों का सवाल ‘कब’। कुछ देर पहले तक गीला सिमेंट मात्र सिमेंट भर था। अब वह शर्म से गीला-गीला हो चुका था। मानो उस लड़की ने निर्जीव सिमेंट पर ‘कब’ लिखकर उसे जीता-जागता आईना बना दिया हो। दिखने में मात्र दो अक्षरों का सवाल ‘कब’ था लेकिन परोक्ष रूप से कई सवालों के प्रतिबिंब के रूप में चीख-चीखकर हमसे, आपसे और सबसे कुछ जवाब मांग रहे थे।
मुस्कानों को गाड़कर कब्रस्तान बनाने वाले चेहरे पर खुशियाँ कब लौटेंगी? चुपचाप जलने वाली चिताओं की आग को बुझाने वाली साँस रूपी हवा में लंबी उम्र का तरल जल कब लौटकर आएगा? वे मछुआरे जो बहुत जल्द लौटकर आने का वादा करके गए थे, वे कब लौटेंगे? उनकी राह जोहती आँखों को सुकून कब मिलेगा? अपने प्यारों की चिंता में पल-पल घुट-घुटकर मरने वालों को उनके लौटने की खुशखबरी कब मिलेगी?
कुछ बाहें माँ-बाप से लिपटकर ऐसे बिछुड़े जो कि अब तक उसी स्पर्श की याद में रो-रोकर अधमरे हो चुके हैं। न जाने वे कब तक लौंटेंगे? दूध के लिए बिलखते बच्चों को दूध का वादा करके टोकरी कमर पर लटकाए घर से निकली माँ अब तक नहीं लौटी है। न जाने वह किस तूफान में गुम हो गयी है। न जाने कब दूधमुँहे बच्चों का दूध लौटेगा? जब-जब इन सवालों का जवाब भी ढूँढ़ने की कोशिश की जाती है तब-तब ‘कब’ शब्द उलटकर बक-बक करने लगता है।

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

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