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यूपी: अब पंचायत चुनाव में सजेंगे सियासी अखाडे़

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से राजनैतिक अखाड़ा सजने वाला है। इस साल के अंत (अक्टूबर-नवंबर) में संभावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी, सपा-बसपा और कांगे्रस सभी अभी से पंचायत चुनाव में अपनी ताकत का इजहार करने के किए जुट गए हैं। अबकी से नये चेहरे के रूप में आम आदमी पार्टी(आप) ने भी यूपी पंचायत चुनाव में उतरने का संकेत देकर अन्य दलों की धड़कने बढ़ा दी हैं। उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में ‘आप’ अपने उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह झाड़ू पर लड़ाएगी या फिर निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन देगी,यह स्पष्ट होना बाकी है। दरअसल, तमाम सियासी पार्टिंया पंचायत चुनाव अपने चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़ते हैं, इसकी जगह वह अपने किसी नेता को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतार कर उसको पार्टी का समर्थन दे देते हैं।
बहरहाल, इस बार उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव कई मायनों में पिछले चुनाव से अलग होंगे। अबकी ग्राम पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान, जिला पंचायत सदस्य और क्षेत्र पंचायत सदस्य के चारों पदों पर एक साथ मतदान करवाने की तैयारी आयोग कर रहा है, क्योंकि पिछली बार 2015 के ग्राम पंचायत चुनावों में मतदाताओं को दो बार मतदान करना पड़ा था। साल के अंत में सभांवित पंचायत चुनावों में सबसे पहले परीसीमन पर काम होना है. जिसके बारे में अपर निर्वाचन आयुक्त वेद प्रकाश ने बताया कि पंचायत चुनाव के लिए उन्हीं ग्राम पंचायतों का परिसीमन किया गया है जिनका कुछ क्षेत्र नगर निकाय सीमा में चला गया था. 30 जून तक चलने वाले इस वृहद पुनरीक्षण में बूथ लेबल आफिसर ग्रामीण इलाकों में घर-घर जाकर वोटर लिस्ट को अपडेट करेंगे. इस अभियान में करीब 94 हजार बीएलओ लगाए जाएंगे. आयोग के एडीशनल इलेक्शन कमिश्नर वेद प्रकाश वर्मा ने बताया कि बीएलओ की सूची तैयार कर आयोग को भेजने के निर्देश दे दिए गए हैं. बता दें कि राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रदेश की 75 जिला पंचायतों, 821 क्षेत्र पंचायतों और 58,758 ग्राम पंचायतों में विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची से चुनाव कराने का प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजा था. हालांकि अपर निर्वाचन आयुक्त वेद प्रकाश कहतें हैं कि जिला पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और ग्राम पंचायतों की संख्या में बदलाव भी संभव है. जिसे परीसीमन के बाद फाइनल किया जाएगा. अपर निर्वाचन आयुक्त कहते हैं कि आयोग की मतदाता सूची सर्वश्रेष्ठ है. इसलिये पंचायत चुनाव की मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि और जनता बढ़-चढ़ कर शामिल होते हैं. 2015 में आयोग की ही सूची से शांतिपूर्ण 77 फीसदी मतदान हुआ था. सूची को लेकर कोई शिकायत या आपत्ति नहीं मिली थी. फिलहाल 25 दिसम्बर 2020 से पहले हर हाल में आयोग को ग्राम पंचायत चुनाव खत्म कर लेने होंगे क्योंकि अगर समय पर चुनाव नहीं सम्पन्न कराए गएं तो प्रशासक नियुक्त करने पड़ते हैं, जिससे सभी काम रुक जातें हैं. लिहाजा आयोग की कोशिश है कि समय पर चुनाव करा लिये जाएं.
बात आम आदमी पार्टी की कि जाए तो पंचायत चुनाव में उतरने से पूर्व आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में 25 लाख नए कार्यकर्ताओं को जोड़ेगी। आप प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश के 1.07 लाख गावों में जाएंगे और उनके मुद्दों को जानेंगे।
खैर, चर्चा पंचायतों की महत्ता की कि जाए तो पंचायत एक तरह से देश की जीवन रेखा जैसे हैं। देश की करीब 70 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है और पूरे देश में दो लाख 39 हजार ग्राम पंचायतें हैं। त्रीस्तरीय पंचायत व्यस्था लागू होने के बाद पंचायतों को लाखों रुपए का फंड सालाना दिया जा रहा है। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य की जिम्मेदारी प्रधान और पंचों की होती है। इसके लिए हर पांच साल में ग्राम प्रधान का चुनाव होता है, बात ग्राम पंचायत की कि जाए तो कसी भी ग्रामसभा में 200 या उससे अधिक की जनसंख्या का होना आवश्यक है। हर गाँव में एक ग्राम प्रधान होता है। जिसको सरपंच या मुखिया भी कहते हैं। 1000 तक की आबादी वाले गाँवों में 10 ग्राम पंचायत सदस्य, 2000 तक 11 तथा 3000 की आबादी तक 15 सदस्य होने चाहिए। ग्राम सभा की बैठक साल में दो बार होनी जरूरी है। जिसकी सूचना 15 दिन पहले नोटिस से देनी होती है। ग्रामसभा की बैठक बुलाने का अधिकार ग्राम प्रधान को होता है। बैठक के लिए कुल सदस्यों की संख्या के 5वें भाग की उपस्थिति जरूरी होती है।

अजय कुमार, लखनऊ

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