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शिक्षा गुणवत्ता में सबसे फिसड्डी उत्तरप्रदेश को चलना है मीलों दूर

नीति आयोग ने 2016-17 के आंकड़ों के आधार पर ‘स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स’ जारी की है। इसमें स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में पहले स्थान पर केरल, दूसरे स्थान पर राजस्थान व तीसरे स्थान पर कर्नाटक रहा। उत्तर प्रदेश का नाम सबसे नीचे है। स्कूली शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक एक समग्र सूचकांक है जो नीति आयोग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संकल्पित-निर्मित किये गए शिक्षा गुणवत्ता के प्रमुख डोमेन के आधार पर राज्यों के वार्षिक सुधारों का आकलन-मूल्यांकन करता है। इसमें स्कूली विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता बढ़ाने के उपायों के मूल्यांकन पर जोर दिया गया है। स्कूली शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक वास्तव में सीखने की प्रक्रिया, शिक्षा में बुनियादी ढाँचागत विकास, शिक्षा की पहुँच, समतावादी शैक्षिक उपागम पर आधारित है। यह रिपोर्ट राज्य द्वारा किये गए सर्वेक्षण के आँकड़े और तीसरे पक्ष के सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। नीति आयोग द्वारा जारी स्कूल एजुकेशन क्वॉलिटी इंडेक्स से पता लगा कि देश के राज्यों में स्कूली शिक्षा में काफी असमानता है। स्कूलों को कई मानकों के आधार पर स्कोर दिया गया है। उन स्कोरों के आधार पर केरल शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में टॉप पर है। केरल को इस इंडेक्स में 76.63 स्कोर मिला है। फिर 72.86 स्कोर के साथ दूसरे नंबर पर राजस्थान है। सबसे फिसड्डी उत्तर प्रदेश साबित हुआ है जिसको सिर्फ 36.42 स्कोर मिला है।

इंडेक्स से यह भी पता चला है कि प्राथमिक स्तर पर नामांकन में गिरावट आई है जो बहुत चिंताजनक है। पुस्तकालय और कंप्यूटर शिक्षा तक पहुंच के मामले में राज्यों में बड़ी असमानता देखी गई है। स्कूलों में पुस्तकालय, रीडिंग रूम या बुक बैंक की सुविधा नहीं है।सूचकांक का उद्देश्य राज्यों के फोकस को शैक्षिक निवेश से परिणाम की ओर स्थानांतरित करना है। साथ ही लगातार वार्षिक सुधारों के लिये शैक्षिक मानक प्रदान करना है। गुणवत्ता में सुधार करना, सर्वोत्तम साधनों को साझा करना तथा राज्य के नेतृत्व वाले नवाचारों को प्रोत्साहित करना है। इस सूचकांक में 34 संकेतक और 1000 अंक रखे गए। इनमें सीखने की प्रक्रिया को सबसे अधिक 1000 में से 600 अंक का भार दिया गया है। रैंकिंग के अनुसार देश भर में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर पाया गया है। रैंकिंग के अनुसार, 20 बड़े राज्यों में केरल 76.6% के स्कोर के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन कर प्रथम स्थान पर रहा जबकि उत्तर प्रदेश 36.4% के स्कोर के साथ अंतिम स्थान पर रहा। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा समस्याओं के ढेर पर बैठी है। जहाँ एक तरफ उत्तर प्रदेश शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है तो वहीं शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यार्थियों और शिक्षकों के अनुपात में भारी अंतर इस समस्या को और जटिल बना रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 1 लाख 43 हजार 926 प्राथमिक शिक्षकों की कमी है। बहुत कम शिक्षक, कम्बाइंड क्लासेज और शिक्षकों पर बढ़ता डाक बाबू का कागजी काम, यह उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर है। ‘असर’, 2018 की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठाती रही है। ‘असर’ 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक कक्षा पांच में पढ़ने वाले प्रदेश के लगभग 50 फीसदी छात्र कक्षा दो के पाठ को पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार गणित के भाग और घटाने जैसे सवाल हल करने में भी प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों के छात्र काफी पिछड़े हैं। शिक्षकों की कमी और उनको होने वाली परेशानियों को लगातार उठाने वाले यूपी प्राथमिक शिक्षक संघ ने शिक्षक दिवस 5 सितंबर, 2019 को शिक्षक सम्मान बचाओ दिवस के रूप में मनाया। सरकार से मांग की कि हर प्राथमिक स्कूल में कम से पांच शिक्षक और एक प्रधानाध्यपक की नियुक्ति की जाए। लेकिन यह मांग कोसों दूर दिखाई पड़ रही है। इसके अलावा शिक्षक संघ हर प्राथमिक विद्यालय में एक क्लर्क और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी रखने की मांग कर रहा है ताकि शिक्षकों के ऊपर कागजी काम का बोझ ना हो और वे सिर्फ और सिर्फ शिक्षण कार्य पर ही ध्यान दें। आँकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के 1506 स्कूलों में आज भी छात्र और शिक्षक दोनों खुले में टॉयलेट जाने को मजबूर हैं। 54,121 प्राइमरी और हायर सेकेंडरी स्कूलो में चारदीवारी नहीं हैं। 2,921 स्कूलों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है। कई स्कूल तो तबेला बन गए हैं। यहाँ छात्रों की जगह भैंस-बकरी आद‍ि बंधे नजर आते हैं। प्रदेश में हैं कुल 1,58,839 प्राइमरी और हायर सेकेंडरी स्कूल हैं। आज भी 68,603 प्राइमरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों में छात्र जमीन पर बैठकर पढ़ते हैं। प्रदेश में कुल 45590 हायर सेकेंडरी स्कूलों में से 18,888 स्कूलों में चारदीवारी नहीं है। 23,314 स्कूलों में बिजली की व्यवस्था नहीं है। 334 स्कूलों में छात्रों हेतु व 151 स्कूलों में छात्राओं हेतु टॉयलेट नहीं है। 1,379 स्कूलों में पीने का पानी नहीं है। व्यावहारिक यह है कि हर कक्षा पर एक शिक्षक हो, ताकि अलग-अलग कक्षा के अलग-अलग पाठ्यक्रमों को उचित ढंग से पढ़ाया जा सके। इसके अलावा प्राथमिक विद्यालयों के बुनियादी जरूरतें जैसे- स्कूल बिल्डिंग, फर्नीचर बेंच, बिजली, ब्लैक बोर्ड, पेयजल आदि चीजों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है ताकि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलने का लक्ष्य पूरा हो सके। उत्तरप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर गुणवत्ता पूर्वक रूप से स्थापित करने के लिए हमें अभी कई-कई मीलों दूर तक चलना होगा।

— रामविलास जांगिड़, 18, उत्तम नगर, घूघरा, अजमेर (305023) राजस्थान

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