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विलुप्तता का खंजर

गानेवाली चिड़िया की कहानी हम सभी जानते हैं। कहानी का सार यह है कि एक राजा जो गानेवाली चिड़िया की आवाज़ से वंचित होने पर मौत की कगार पर पहुँच जाता है, उसे अंत में चिड़िया की मीठी आवाज़ ही बचाती है। यह केवल एक चिड़िया की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे जीवन में चिड़िया महत्ता की सच्चाई का प्रतीक है। साहित्य से लेकर जनमानस तक और फिल्मी गीतों से लेकर मुहावरों-कहावतों तक चिड़ियों का बोलबाला है। फिर चाहे कोयल सी तेरी बोली वाला गाना हो या फिर अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत जैसी कहावत, सब में चिड़ियों का जिक्र होता रहता है।
चिड़ियों की पहली कहानी रामायण में पढ़ने को मिलती है। मिथुन क्रीड़ा में मग्न क्रौंच पक्षी का शिकारी के द्वारा शिकार होना साहित्य के नवांकुर की याद दिलाता है। क्रौंच पक्षी के मृत शोक को कवि वाल्मीकि ने श्लोक के रूप में प्रस्तुत किया है। इस पीड़ा से पंत की वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान की पंक्तियाँ सत्य की चौखट पर चरितार्थ होती हैं। क्रौंच पक्षी का दूसरा नाम ही सारस है। मांसाहारियों के लिए इसका मांस स्वादप्रिय होने के कारण आज ये लुप्त हो गए हैं। खास बात यह है कि शिकारी कुछ सारस पक्षियों को पालकर उन्हें प्रशिक्षण देते हैं। प्रशिक्षित सारस पक्षी शिकारी द्वारा फैलाए दानों को चुगने के लिए अन्य सारस पक्षियों को बुलाते हैं। सुना था कि मनुष्य ही अपनी प्रजाति के साथ धोखा करने से पीछे नहीं हटता। किंतु यह कथन सारस पर भी चरितार्थ होती है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ सारस किसी के हाथों मजबूर हैं।
विलुप्तता का खंजर देश में चिड़ियों के भविष्य को लथपथ कर रहा है। प्रकृतिप्रेमी इससे काफी आहत हैं। शहरीकरण, जंगलों की कटाई, पर्यावरणीय प्रदूषण, मनुष्य की जिह्वा तृष्णा के चलते चिड़िया की चीं-चीं-चूँ-चूँ दबती जा रही है। चिड़ियों के विचरणस्थल जैसे- जमीन, आसमान, समुद्र सब पर अहंकारी मानव का कब्जा हो चला है। अब तो उसकी नजर दूसरे ग्रहों तक पहुंच गई है। चिड़िया मनुष्य की क्षमता के आगे बेबस है। वह दिन दूर नहीं मनुष्य की क्षमता ही उसके लिए भस्मासुर का हाथ बन जाएगा।
हमारे देश में अब भी चिड़ियों की चहचहाहट से प्रेम करने वालों की कमी नहीं है। आए दिन दूरबीन, कैमेरा लेकर जंगल में अपने प्रिय चिड़ियों की आवाज़ें सुनने के लिए दर-ब-दर घूमते रहते हैं। किसी समय झुंड में दिखायी देने वाले कौए आज नदारद हैं। गौरेया तो मानो हमारे परिवार का हिस्सा ही बन चुका था लेकिन सेलफोन टावरों के चलते आज वे अतीत के गर्त में धूल फांक रहे हैं।
गाँवों में बड़ी संख्या में दिखायी देने वाले गिद्ध आज हमारे लिए सपना बन गए हैं। गिद्ध ही वे प्राणी हैं जो रोगग्रस्त शवों को खाकर खतरनाक कीटाणु-विषाणुओं को संक्रमित होने से रोकते थे। आज गिद्ध संरक्षण के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने के लिए संस्थाएँ तैयार हैं, लेकिन संरक्षण के लिए गिद्ध ही नहीं हैं। पेड़ों के तनों में घोंसले बनाकर रहने वाले तोते, मैना, कठफोड़वा हमारे बचपन की वो यादें हैं जिनके बिना हमारी कहानियाँ अधूरी हैं। दादा-दादी, नाना-नानी की गोद में सोकर हमने उन चिड़ियों के किस्सों से स्वयं को आनंदित किया है।
तोते का अधखाया अमरूद, कोयल की मीठी बोली, कौओं से मेहमानों का संदेश, गोरैया से बच्चों की चंचलता अब कहाँ बचे हैं? यही कारण है कि आज हमारी बोली में न तो उनकी जैसी मिठास है और न ही सुंदरता। गानेवाली चिड़िया कहानी में जैसे-तैसे राजा मौत के मुँह से निकलकर बच गया। लेकिन आज के समय में मनुष्य, जो स्वयं को सभी जीवों की तुलना में बुद्धि का श्रेष्ठ राजा मानता है, क्या बच पाएगा? नीलेश रघुवंशी के शब्दों में कहना हो तो…

पुलिस ने आतंकवादी को नहीं
मुझे भी नहीं
मेरे सपने को गिरफ्तार कर लिया
मैं इस दुनिया को
चिड़िया की आँख से देखना चाहती हूँ

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://hi.wikipedia.org/s/glu8)

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