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विश्वास + त्याग = प्रेम

वैलेंटाइन डे पर विशेष  

ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है जिसमें डूब के जाना है

जिगर मुरादाबादी ने इश्क को आग का दरिया बताया है। यह सच भी है। इश्क, प्रेम, प्यार, मोहब्बत आप चाहे इसे जिस नाम से पुकारें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि शब्दों के पर्याय हो सकते हैं, किंतु पीड़ा के नहीं। यह तो दो हृदयों के बीच का वह अहसास है जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। गणित में एक और एक दो होते हैं, लेकिन प्रेम में एक और एक ग्यारह हो सकते हैं या फिर दो हो सकते हैं या फिर शून्य हो सकता है। इसका गणित आज तक किसी के पल्ले नहीं पड़ा। जिसके पल्ले पड़ा या तो वो शाहजहाँ-मुमताज बन गए या फिर लैला-मजनू। प्रेम में मिठास है तो कड़ुवाहट भी है। नजदीकी है तो दूरी भी है। ठंडक है तो गर्मी भी है। चैन है तो बेचैनी भी है। हँसी है तो रोना भी है।
प्रेम में गजब शक्ति है। चुंबकीय नियम के अनुसार दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, जबकि समान ध्रुव इसके विपरीत विकर्षित करते हैं। इस नियम के अनुसार प्रेम में विजातीय लिंग का आकर्षण सहज है, जबकि आज के समय में एल.जी.बी.टी. (लेस्बियन, गे, बाई-सेक्सुअल तथा ट्रांसजेंडर) जैसे लोगों में समलिंगिय प्रेम अपने चरम पर है। समलिंगिय प्रेम चुंबकीय नियमों को चुनौती देते हुए एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जहाँ लिंग की प्रधानता से उठकर दो हृदयों के मेल को महत्व देता है। हाँ यह अलग बात है कि भारत जैसे देश में समलिंगिय प्रेम अवैध माना जाता है। प्रेम का रसायन शास्त्र आयु, लिंग, जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज, परंपरा किसी की परवाह नहीं करता। इसकी रासायनिक प्रतिक्रिया में दो हृदय इतने ठोस बन जाते हें जो दो बदन एक जान की तरह जीवन जीते हैं।
किसी दूसरे के प्रेम को देखकर कभी-कभार हमें उसे बचकाना हरकत कह देते हैं। किंतु वही प्रेम जब हमें होता है तो एक वटवृक्ष की तरह हृदय में उगने लगता है। उसकी जड़ें हमारे शरीर में धँसते-धँसते हमें पूरी तरह से अपने बस में कर लेता है। तब हमें दिन-रात का अंतर पता नहीं चलता। भूख-प्यास, नींद-चैन सब गँवा देते हैं। जिसके लिए प्रेम मधुर बना उसके लिए यह जीवन क्षणिक लगता है और जिसके लिए यह कठोर है उसे एक पल भी युग सा प्रतीत होता है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रेम को परिभाषित किया जा सकता है? क्या इसका कोई रूप, स्वभाव या आभास होता है? यदि हम सीता और राम के प्रेम को देखते हैं तो वे निस्वार्थ प्रेम व त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। सीता के मन में कभी कोई शिकायत या राम को लेकर कोई उलझन नहीं थी। जीवन ने जो भी दिया, सीता ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। निश्चित रूप से इस ज़माने में राम की इसीलिए आलोचना होती है की उन्होंने सीता के साथ न्याय नहीं किया, मगर जहाँ तक सीता का सवाल है उनके प्रेम में किसी तरह की कोई आशा या निराशा नहीं और न ही कोई शर्त। राम-सीता का प्रेम एक दूसरे के विश्वास और त्याग का प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर राधा ने इसे और एक अलग अर्थ दिया। समाज और उम्र के बंधन तोड़े और प्यार को न सिर्फ शारीरिक सुख से अलग किया वरन प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ी, और वह था हर हाल में प्रियतम की कुशल-क्षेम की कामना। प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं होता। कभी-कभी जो मजा खोकर मिलता है वह पाकर नहीं। इसका उदाहरण साक्षात राधा-कृष्ण हैं। दोनों का प्रेम त्याग और विश्वास का सटीक उदाहरण है। मीरा का प्रेम तो और भी अदभुत था। न शरीर की चाह, न मिलन की आस और न ही किसी सुख की लालसा। बस सब कुछ छोड़ कर निकल पड़ी, ऐसे प्रियतम को खोजने के लिए जिसकी उन्होंने सिर्फ किवदंतियां ही सुनी थीं।
रूमी ने प्रेम को एक खामोश फ़साना, एक निशब्द अहसास बताया है। प्रेम बस एक अगाध स्नेह का नाम है, जिसके भी जीवन में प्रवेश करता है उसे सुवासित कर देता है। दैहिक प्रेम क्षणिक होता है जबकि ऐहिक प्रेम शाश्वत। जो भी हो प्रेम चाहे क्षणिक हो या शाश्वत सच्चा ही रहता है। प्रेम सच्चा नहीं तो केवल दिखावा बनकर रह जाता है। मात्र लेन-देन का व्यापार बन जाता है जिसमे सुविधाओं का, साधनों का आदान-प्रदान होता है। वास्तव में प्रेम एक शाश्वत भाव है। जो कल भी था आज भी है और कल भी रहेगा। प्रकृति के कण-कण में प्रेम समाया है। प्रेम की ऊर्जा से ही प्रकृति निरंतर पल्लवित, पुष्पित और फलती-फूलती है। युगों से चली आ रही प्रेम कहानियाँ आज भी बदस्तूर जारी हैं। प्रेम की अनुभूति अपने आप में अनोखी, अद्भुत और चमत्कारी हैं। किसी से प्रेम करना संसार की सबसे सुखद अनुभूति है। यह प्रेम माता-पिता, भाई-बहन, मित्र अथवा किसी भी अजनबी से हो सकता है।
वास्तव में यह क्यों होता है? कैसे होता है? कब होता है? किससे होता है? इन प्रश्नों के सटीक उत्तर आज तक कोई नहीं दे पाया है। कभी दुनिया प्रेम करने वालों को सर-आँखों पर बैठा लेती है तो कभी प्रेम में तलवारें खिंच जाती हैं, गोलियाँ चल जाती हैं और खून की नदियाँ बह जाती हैं। यूँ तो प्रेम के सबके अपने-अपने मायने हैं। प्रेम को लेकर सबकी अपनी सोच है। माना जाता है कि प्रेम का संबंध आत्मा से होता है। प्रेम में समर्पण, विश्वास और वचनबद्धता की दरकार होती है, लेकिन आज समय बदल रहा है। ‘ग्लोबलाइजेशन’ ने दुनिया को मुट्ठी में भर दिया है। इस बदलते युग में प्रेम भी बदल रहा है, युवक-युवतियों का साथ में घूमना, प्रेम का प्रदर्शन सरेआम करना अब ‘फैशन’ कहलाने लगा। प्रेम में पहले बरसों इंतजार में गुजार दिए जाते थे, लेकिन अब कोई इंतजार में वक्त ‘जाया’ नहीं करता। अब प्रेम के स्वरूप, स्थायित्व और उसे अभिव्यक्त करने के माध्यमों में बदलाव आ रहा है। ‘मोबाइल’ और ‘इंटरनेट’ के जरिए गली, मोहल्ले और परिचितों में सिमटे प्रेम के अवसर आज के युवाओं के लिए विश्व-व्यापी हो गए हैं।
आज युवाओं की सोच बदल गई है, सामाजिक मूल्यों में बदलाव आ रहा है। अब प्रेम में भी युवा बहुत ‘प्रेक्टिकल’ हो चला है। मौसमों के बदलने की तरह उसके ‘ब्रेक अप’ और ‘पैच अप’ होते हैं। वह मानता है कि बिना गर्ल फ्रेंड के कॉलेज लाइफ में मजा नहीं है, लेकिन शादी के लिए वह घरवालों से बैर लेने के ‘मूड’ में नहीं होता और उनकी मर्जी को प्राथमिकता देता है। भोगवादी संस्कृति में पल रहा युवा भावों की गहराई को समझ ही नहीं पाता। प्रेम के लिए इस तरह की सोच कितनी सही और कितनी गलत है, इसका फैसला भी खुद युवाओं को ही करना होगा। तुलसीदास ने रामचरित मानस में सीता के बहाने प्रियवर राम के लिए अपने उद्गार प्रकट करते हुए दो बदन एक जान की बात कहते हैं और आदर्श प्रेम की इमारत को कुछ इस तरह गढ़ते हैं-

तत्व प्रेम कर मम अरू तोरा l जानत प्रिया एकू मन मोरा ll
सो मन रहत सदा तोही पाही l जान प्रीति रस एत्नही मांही ll

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://hi.wikipedia.org/s/glu8)

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