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पुण्यतिथि : विविधता की पंखुड़ियों वाली सरोजिनी

2 मार्च – सरोजिनी नायडू की पुण्यतिथि पर विशेष लेख

“राष्ट्र अलग है, देश अलग है, मेरा उससे क्या लेना-देना सोचने वालों- खबरदार हो जाओ! देश गुलाम है तो तुम भी गुलाम समझे जाओगे।” ऐसी असीम देशभक्ति रखने वाली भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अमूल्य भेंट के रूप में सरोजिनी नायडू हमारे देश की शान हैं। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर देश उन्हें हृदय की गहराई से श्रद्धांजली व्यक्त करता है। कविता, प्रेम, स्वराज्य कामना, देशभक्ति, महिला सशक्तीकरण सभी उस सरोजिनी की विकसित पंखुड़ियाँ हैं।
सरोजिनी नायडू का जन्म हैदराबाद में 13 फरवरी, 1879 को हुआ था। पिता अघोरनाथ चटोपाध्याय महान विद्वान थे। निजाम कॉलेज के प्रथम प्राचार्य थे। माँ वरदसुंदरी प्रसिद्ध कवयित्री थीं। माता-पिता मूलतः बंगाल के थे। वे कुछ कारणों से हैदराबाद आकर स्थिर हो गए। मात्र 12 वर्ष की अवस्था में सरोजिनी नायडू का नाम देशभर में गूँजने लगा। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से मैट्रिक्युलेशन की परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त कर देश में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था। उर्दू, तेलुगु, अंग्रेजी, बंगाली, फारसी भाषाएँ सीखकर छोटी सी आयु में उन्होंने एक कविता लिखी – ‘द लेडी ऑफ द लेक’। यह कोई ऐसी-वैसी कविता नहीं थी। पूरे 1300 चौपाइयों में लिखी कविता थी। बाद में, फारसी भाषा में ‘माहेर मुनीर’ नामक नाटक लिखा। यह नाटक इतना प्रभावी था कि तत्कालीन निजाम नरेश ने उनकी विदेशी शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देने की घोषणा की। वे 16 वर्ष की आयु में लंदन के किंग्स कॉलेज में आगे की पढ़ाई के लिए पहुँची। इसके बाद वे कैंब्रिज के गिर्टन कॉलेज पहुँची। सच तो यह है कि उनकी पढ़ाई वहाँ उतनी संतोषजनक नहीं थी। किंग्स कॉलेज में पढ़ाई करते हुए उनका परिचय उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकारों आर्थर साइमन, एडमंड गासे से हुआ। उनसे साहित्यिक ज्ञानोपार्जन कर अपनी विदेशी शिक्षा को साहित्यिक ढंग से परिभाषाति करने का सफल प्रयास किया। वे गासे ही थे जिनकी सलाह उन्होंने अपनी कविताओं में भारतीय नदियों, पर्वतों, समुद्रों का वर्णन करना आरंभ कर दिया। उनकी शिक्षा में अरुचि का एक और बड़ा कारण था- उनकी प्रेम कथा। जब वे 15 वर्ष की थीं तभी उनका परिचय डॉ. मुत्याल गोविंदराजु से हुआ। उनका प्रेमी उनसे दस वर्ष बड़ा था। प्रेम अंधा होने के कारण उन्होंने इन सब बातों की परवाह नहीं की। दोनों इंग्लैंड में पढ़ाई करते थे। दोनों के बीच प्रेमपत्रों का एक लंबा सिलसिला चला। परिणामस्वरूप 1898 में भारत लौटते ही दोनों ने विवाह कर लिया। यह विवाह उस समय काफी चर्चा में था। दोनों अलग-अलग जातियों के होने के बावजूद समाज की परवाह नहीं की तथा उस समय की संकीर्ण जातिगत विचारधारा को ध्वस्त करने का श्रीगणेश किया। उनकी चार संतानें हुईं।
सन् 1905 का बंगाल विभाजन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरणास्पद ऐतिहासिक घटना थी। उनकी जन्मभूमि को रक्तरंजित करने वाले अंग्रेजों के प्रति उनका द्वेष सातवें आसमान पर था। प्रतिशोध की भावना से वे कांग्रेस पार्टी में भर्ती हुई। महात्मा गांधी, गोखले, एनी बिसेंट, मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर पंडित नेहरु तक सभी उनके अच्छे मित्र थे। रवींद्रनाथ टैगोर के प्रति उनके हृदय में अमित स्नेह व आदर था। उनके साथ काफी घुल-मिलकर रहती थीं। उन्होंने अपनी पहली रचना के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना की जीवनी लिखी। सन् 1925 में आयोजित कानपुर कांग्रेस महासभा में बतौर अध्यक्ष के रूप में अपना योगदान दिया। कांग्रेस महासभा की प्रथम महिला अध्यक्ष बनने का सम्मान इन्हीं को प्राप्त है। उस दिन से जब भी कोई स्वतंत्रा आंदोलन होता तो उसमें सभी दिग्गज नेताओं के साथ सरोजिनी नायडू का नाम अनिवार्य रूप से गूँजता। भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्होंने 21 माह तक कारावास की सजा भुगतीं। सरोजिनी की शिक्षा, विवाह, कविता प्रेम, आंदोलन ये सब महिला सशक्तीकरण का अद्भुत दृश्य था। उनका मानना था कि महिलाएँ किसी से कम नहीं हैं। वे अगर ठान लें तो चट्टान को तोड़कर रेत बना सकती हैं। इसी विश्वास की अलख फैलाने के लिए उन्होंने देशभ्रमण किया।
सरोजिनी नायडू अपनी व्यस्तता के बीच कविता के लिए समय निकाल ही लेती थीं। “सपनों के होंठ पर बैठने वाली, ओंस की बूँद जैसी मेरे गीतों में सितारे की तरह चमकने वाली…ओ चिड़िया” ये पंक्तियाँ सरोजिनी नायडू द्वारा लिखी कविता ‘ओ चिड़िया’ में उन्हीं के लिए समर्पित हैं। वे स्वयं को किसी नन्हीं चिड़िया की तरह ही आंकती थीं। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने उन्हें भारत कोकिला की उपाधि से सम्मानित किया। बहुत कम लोग जानते हैं कि सरोजिनी नायडू गंभीर क्षणों में भी अपने मजाकिया स्वभाव से माहौल को समरस बना देती थीं। इसीलिए दांडी मार्च में महात्मा गांधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली भारत कोकिला को मिक्की मौस के नाम से भी जाना जाता है। यह उपाधि भी महात्मा गांधी के द्वारा दी गई है। आज भी मुंबई के ताज होटल में सरोजिनी दीर्घा के नाम से एक हाल है, जहाँ आए दिन कवि सम्मेलन होते रहते हैं। कोरमंडल फिशर्स, आटमसांग, इंडियन वीवर्स, बैंगिल सेल्लर्स, एकास्टसी, एन इंडियन लव सांग, क्रैडिल सांग, ए लव सांग फ्रॉम दि नार्थ जैसी कविताएँ कोयल की कूक से फूटीं रचनाएँ हैं। इन्हीं रचनाओं ने उन्हें भारत कोकिला के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। स्वतंत्र भारत में प्रथम महिला राज्यपाल (उत्तर प्रदेश) होने का अपूर्व गौरव प्राप्त करने वाली हम सब की चहेती भारत कोकिला आज ही के दिन सन् 1949 में सदा-सदा के लिए शांत हो गईं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://hi.wikipedia.org/s/gm8o)

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