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(व्यंग्य ) : बीमा बालाओं की मार्केट बाजी !

“नमस्कार जी! आप जांगिड़ जी बोल रहे हैं!” “जी फिलहाल तो बोल रहा हूँ। मैंने बोलकर बोल ही दिया आखिर।” तब आवाज घनघनाई -“मैं कसाईबसाई बीमा कंपनी से बोल रही हूँ और आपका बीमा कराने के लिए आपको नई स्कीम देना चाह रही हूँ।” नहीं जी मैं जागिड़ नहीं बोल रहा हूँ। मैं जांगिड़ का भूत बोल रहा हूँ और मुझे किसी भी प्रकार के बीमे की जरूरत नहीं है।” जांगिड़ के भूत ने होशियारी दिखाई। तब वह कान में घुसकर चीखने लगी-“हां मुझे पता है कि आप जांगिड़ के भूत ही बोल रहे हो। वास्तव में हम भूत लोगों के साथ ही ये स्कीम लांच कर रहे हैं। भूत, पिशाच, डाकिनी, चुड़ैल आदि के लिए एक शानदार स्कीम लेकर के आए हैं हम। डर का बीमा भूतलोगों का। आजकल आप भूत लोगों को भारी परेशानी से गुजरना पड़ रहा है। जब आप इंसानों की किसी बस्ती में जाते हैं तो आपको तरह-तरह से डर लगता है। आपसे लूट-खसोट, छीना-झपटी या फिर आपका कोई इंसान रेप-वेप भी न कर दे; इस डर से डरे-मरे से रहते हैं आप भूतलोग! आप डर के मारे एकदम भीगी बिल्ली से बन जाते हैं। इंसानों की बस्ती में जाने से घबराते हैं। विशेष रूप से आप जब किसी भी प्रख्यात-ख्यात या दीगर चालू राजनीतिक पार्टी के किसी गलियारे से गुजरते हैं तब तो आप डर के मारे थर-थर कांप कर सूखे पत्ते से हो जाते हैं। इंसानों के आगे आप प्राय: बेबस ही हो चले हैं। आपका डरना बाजिब भी है। इसलिए हमारी बीमा कंपनी आपके डर का बीमा कराने के लिए नई स्कीम लेकर तैयार खड़ी है। सुनो… ।” फोनियाती बीमा बाला भूत को बीमे के बारे में बड़ी उत्तेजना से समझा रही है।

इधर एक फोन कन्या ने यमराज को पकड़ रखा है। सीन कुछ इस तरह से है कि आगे-आगे यमराज जी हांफते-कांपते, धूल फांकते भागे जा रहे हैं। पीछे-पीछे याक्षिणी फोन कन्या दौड़ी चली जा रही है। वह चीख रही है- “प्लीज! यमराज जी! ठहर जाइए! मैं आपके भले के लिए ही कह रही हूँ। जब आप भैंसे पर सवारी करके किसी की आत्मा को लेने जाते हैं तो आपको बड़ा कष्ट होता है। इंसान की आत्मा आपकी आत्मा निकालने पर उतारू हो जाती है। आप अपनी आत्मा को लिए इधर-उधर भागते हैं। आप चित्रगुप्त के कार्यालयीन आदेशों की पूर्ति के लिए इंसानी आत्मा को इधर-उधर ढूंढ़ते फिरते हैं। आपको इंसानों की आत्मा नहीं मिलती है। कमबख्त इंसान आजकल आत्मा को धरती में कहीं गाड़कर ही जीने लगे हैं। या फिर सारे इंसानों ने किसी रद्दी वाले को अपनी समस्त प्रकार की आत्माएं बेच दी है। आत्मा पकड़ने के इस राजकीय कार्य में आपकी आत्मा हर क्षण मरती जाती है माई डियर यमराज! आपको भारी परेशानी में पल-पल मरना पड़ता है। इसलिए आप आइए और हमारी बीमा कंपनी से अपनी आत्मा का बीमा करा लीजिए; क्योंकि आपकी आत्मा को नोंचने-खोंसने के लिए कदम-कदम पर इंसान खड़े हैं। इंसानों का क्या भरोसा! ठहर जाइए… ।” मामला बड़ा चकाचक चल रहा है। बीमा कंपनियां महामारी की तरह आ रही है। तरह-तरह के बीमे लिए फोनिया रही है। मेरा फिर फोन बज उठा है। मेरी सांसो का बीमा! मेरी लाश का बीमा! मेरी हंसी का बीमा तो मेरे रोने का बीमा! चलूं! बीमा कराने। वरना ये बीमा बालाएं मुझे शमशान घाट तक नहीं छोड़ेगी!

रामविलास जांगिड़,18, उत्तम नगर, घूघरा, अजमेर (305023) राजस्थान

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