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व्यंग्य : इसकी भी जय-जय,उसकी भी जय-जय

” दद्दाजी, क्या बात है!पिछले कुछ दिनों से बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए हैं।आपको तो बात करने की ही फुर्सत नहीं मिल रही है।हम लोग तरस से गए हैं आपकी ज्ञानवर्धक बातें सुनने को।”

” अरे क्या बताऊँ, तुम बात करने की कह रहे हो,यहाँ तो मरने तक की फुर्सत नहीं है। माना कि वे प्रतिदिन अठारह-बीस घंटे काम कर लेते हैं लेकिन हर कोई तो उनके जैसा हो नहीं सकता!उनका बिना रूके काम करते रहने का परिणाम यह हो गया है कि विपक्ष को भी बैठे ठाले काम मिल गया है और इधर अपना काम-धंधा भी चल निकला है और इसीलिए अपने को भी दिन-रात काम में लगे रहना पड़ता है।”

” लेकिन दद्दाजी, उनके काम करने से आपके काम का क्या नाता!”

“कैसी बात करते हो भाई!उनके काम से ही तो हमारे काम-धंधे जुड़े हुए हैं।पहले जो लोग थे,वे अपने घर भरने में ही लगे हुए थे।स्वयं के रोजगार की चिंता में लगा आदमी भला दूसरों को क्या रोजगार देगा! वे दनादन कारनामे किये चले जा रहे हैं ,रूकने का नाम ही नहीं।एक पूरा हुआ नहीं कि दूसरा हाजिर ,ऐसे में स्वाभाविक है कि हमें भी उतना ही सक्रिय रहना पड़ेगा।लोग-बाग बिना बात बेमतलब ही पीछे पड़ गए हैं कि देशभर में रोजगार की कमी आ गई है, रोजगार का संकट पैदा हो गया है।कितनी गलत बात कर रहें हैं।खाली-पीली की बोम मार रहे हैं।यहाँ तो काम करने वाले नहीं मिल रहे हैं।जिसको भी लेने जाओ तो मालूम पड़ता है कि बंदा इंगेज है। मेरे पास तो काम करने वालों का टोटा पड़ गया है।”

उन्होंने गहरी सांस लेते हुए फिर अपनी बात आगे जारी रखी – ” तुम्हें मालूम है कि मुझे कितना बिजनेस मिल रहा है?नहीं न! एक बुलाकर कहता है कि अपने समर्थन में बढ़िया धांसू लिखने वालों को इंगेज कर लो तो दूसरा भी आ पहुँचता है और कहता है कि कुछ ऐसा लिखवा दो कि पक्ष में बात करने वालों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाए।इतने लोगों को रोजगार देने के बाद भी लिखने वाले कम पड़ गए हैं।सोशल मीडिया पर ही दोनों पक्षों के लिए बड़ी टीम लगा रखी है।वाक् युद्ध के लिए योद्धाओं को मोर्चे पर लगाना ही पड़ता है।आखिर दोनों पक्षों के मैन पॉवर की आपूर्ति मुझे ही करना पड़ती है।अभी तो पत्थरबाजों की बहुत डिमांड चल रही है।पुलिस प्रशासन की तरफ से मांग आई हुई है।उनको इतना अनुभव नहीं है न!हाँ,तुम भी चाहो तो तुम्हें अपनी एक पत्थरबाजी टीम का हेड बना दूं।वैसे भी यह कलम घिसते रहने के काम में कितना कमा लेते हो!इसमें तुम्हें मिलता ही क्या होगा।स्वान्तःसुखाय के लिए कागज काले करने से दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती होगी।क्यों घरवालों की बद्दुआ लेते हो! कुछ काम करो।जिस विचारधारा के समर्थक होंगे, उधर की टीम में शामिल करवा देंगे।या दोनों तरफ।बस, हमारे साथ जुड़ भर जाओ।इधर से भी पैसा,उधर से भी पैसा।”

“किन्तु दद्दाजी, यह तो गलत बात है,यह तो बेईमानी है।हमें किसी एक के प्रति संनिष्ठ होना चाहिए।”

“कैसी बात करते हो!जब उनकी निष्ठा अपने देश के प्रति ही नहीं है तो हम कैसे किसी व्यक्ति या पार्टी के साथ रख सकते हैं।जहाँ भी अच्छा दाम और रूपल्ली मिले,हम तो वहीं के हो जाते हैं।इसकी भी जय-जय,उसकी भी जय-जय।”

डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

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