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व्यंग्य : किराये की कोख का सौदा

रामरतन बाबू बड़े ध्यान से टी.वी. पर समाचार देख रहे थे। समाचार में ऐसा कौनसा अलाउद्दीन का खजाना मिल गया कि वे तुरंत अपनी धर्मपत्नी को जोर-जोर से आवाज देने लगे। उनकी पत्नी दौड़ी-दौड़ी आयी और उनके उतावलेपन का कारण पूछा। तो उन्होंने बताया कि अब हमारे घर में जल्द बच्चे की किलकारी सुनने को मिलेगी। अब मैं दादा और तुम दादी कहलाओगी। पत्नी अपने पति की बात को किसी अनबुझ पहेली की तरह सुन रही थी। मुँह पर प्रश्नवाचक चिह्न साफ झलक रहा था। रामरतन बाबू अपनी पत्नी को अच्छी तरह से जानते थे। सो, उन्होंने समझाते हुए कहा, “अरे भाग्यवान! भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। इसके अनुसार अब न केवल रिश्तेदारों बल्कि अन्यों को सेरोगेसी (किराये की कोख) माँ बनने का पूरा अधिकार है। अब तक हमने रिश्तेदारों से कई बार पूछा। सभी ने न-नुकूर ही किया। दुनिया में कई औरतें ऐसी हैं जिन्हें रुपयों की बहुत जरूरत है। कोई-न-कोई तो हमारे बेटे और बहू की झोली में संतान दे ही देगी।”
दूसरी ओर रामरतन के बेटे और बहू में आए दिन किसी-न-किसी बात पर झगड़े होते ही रहते थे। बेटा समाज की तूती बोलता और बहू को बाँझ कहकर संतानहीनता का सारा दोष उसी पर मढ़ देता। बहू भी कम न थी। वह भी अपने पति को सीधे-सीधे न सही परोक्ष रूप से ही नामर्द कहने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ती थी। वो तो रामरतन थे, जो दोनों को एक छत के नीचे जैसे-तैसे मिलजुलकर रहने के लिए सारे जुगाड़ लगाते रहते थे। उन्हें पता था कि यह सब किच-किच संतानहीनता के कारण हैं। उन्हें पूरा विश्वास था कि एक बार घर में संतान आ जाए सारा मामला रफा-दफा हो जाएगा। लाख हाथ-पैर मारने के बाद वर्षा नाम की एक विधवा मिली, जो किराये की कोख के लिए तैयार हो गई।
रामरतन ने बेटे और बहू को समझाया और वर्षा के साथ डॉक्टर के पास पहुँचे। वहाँ डॉक्टर ने वर्षा की डॉक्टरी परीक्षा की। वह सेरोगेसी संतान को जन्म देने के लिए पूर्ण रूप से चुस्त-दुरुस्त थी। डॉक्टर को गवाह बनाकर पूरे पाँच लाख रुपये में सौदा तय हुआ। अग्रिम राशि के रूप में एक लाख और गर्भ धारण करने के नौ महीने बाद जन्म लेने वाली संतान को बेटे-बहू के हाथों में सौंपने पर शेष चार लाख। वर्षा पाँच लाख रुपये की राशि से बड़ी खुश थी। दो साल पहले उसके पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। वह घर का राशन-पानी, बच्चों की स्कूल फीस, कपड़ा-लत्ता, घर का किराया और छोटी-छोटी जरूरतों के लिए आए दिन ताने सुनती थी। यदि वह नौ महीने के बाद रामरतन के परिवार को सकुशल संतान दे देती है, तो उसकी गरीबी कुछ हद तक दूर हो सकेगी। इसलिए वह डॉक्टर की निगरानी में अपने गर्भ में पल रहे रामरतन के वंशज का बड़ा ख्याल रखने लगी।
करीब पाँच महीने के बाद एक अजीब घटना घटी। बेटे और बहू ने बारी-बारी वर्षा को फोन किया। उसे धमकाया कि वह गर्भ में पल रहे उनके बच्चे को गिरा दे। वर्षा को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। वह करे तो क्या करे? कुछ दिनों के बाद वह रामरतन से मिली। उन्हें एक कवर थमाया और वहाँ से चली गई। जब रामरतन ने कवर खोला तो देखा कि उसमें एक लाख रुपये थे और साथ में एक चिट्ठी। काँपते हाथों से उन्होंने चिट्ठी को पढ़ना आरंभ किया। चिट्ठी में लिखा था, “पिता समान रामरतन जी, प्रणाम! मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ। कोई किराए पर मकान भी लेता है तो उसका बड़ा ख्याल रखता है। दीवार पर एक कील ठोकने से पहले लाख बार सोचता है कि कहीं मकान का मालिक बिगड़ न जाए या फिर दीवार फूहड़ न हो जाए। मैं तो फिर भी जीती-जागती औरत हूँ। आपके बेटे और बहू ने आव देखा न ताव झट से बच्चा गिराने के लिए कह दिया। हाँ यह बात सही है कि मैं यह बच्चा रुपयों-पैसों के लिए कोख में पाल रही हूँ। लेकिन इसका मतलब कतई नहीं कि मैं इतनी बेरहम हो जाऊँ कि एक जीते-जागते बच्चे को मार दूँ। मैं गरीब जरूर हूँ। हैवान नहीं। हाँ सच है कि मैं दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए दर-दर की ठोकर खाती हूँ। लेकिन इतनी भी कमजोर नहीं कि पैसों के लालच में अजन्मे शिशु की हत्यारिन बन बैठूँ। मैं माँ हूँ। कसाई नहीं। आपने मात्र मेरे कोख को किराए पर लिया है, न कि मेरी ममता, प्रेम और पीड़ा को। सरकारें आए दिन सरोगेसी के नाम पर शरीरों का सौदा करने से नहीं हिचकतीं। उनके लिए शरीर किसी बक्से या कमरे से कम नहीं है। मैं सरकार तो क्या दुनिया की सारी शक्तियों को खुली चुनौती देती हूँ कि वे किसी माँ की ममता को नहीं झुका सकतीं। फूल और खुश्बू अटूट हैं। इसका मतलब यह नहीं कि फूल खरीदने के साथ ही खुश्बू पर आपका अधिकार हो गया। फूल तो माध्यम है खुश्बू सर्वव्यापी। उसी तरह कोख को तो खरीदा जा सकता है लेकिन उसकी ममता को कतई नहीं। मैं यह पत्र आपको इसलिए लिख रही हूँ कि आप जैसे भी हैं, अपने बेटे-बहू जैसे बेरहमी तो हरगिज नहीं हैं। मैं नहीं जानती कि आपके बेटे और बहू के संबंध कैसे हैं, लेकिन इतना अवश्य कह सकती हूँ वे इंसान कहलाने योग्य नहीं हैं। क्योंकि इंसान, मारने की बात तो दूर उसके बारे में सोच भी नहीं सकता। इसलिए मैं आपकी रकम आपको लौटा रही हूँ और सौदा तोड़ रही हूँ।” पत्र समाप्त होते-होते रामरतन के आँसुओं से फट चुका था।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://hi.wikipedia.org/s/gm8o)

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