National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

व्यंग्य लेख  : श्री श्री श्री कोरोना महाराज!

यशवंत फिल्म का एक डायलॉग है- एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है। गनीमत मनाइए कि कम-से-कम यहाँ एक मच्छर तो है, जो हमें नंगी आँखों से दिखायी देता है। जबकि दूसरी ओर एक सूक्ष्म प्राणी है, जिसका नाम है- श्री श्री श्री कोरोना जी। न किसी को दिखायी देता है, न ही किसी के हाथ आता है। फिर भी हमसे ताली, थाली और शंख बजाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। डॉन की तरह इसे भी गुमान हो गया है। रह-रहकर यह भी कोरोना को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है कहता रहता है। डॉन को तो सिर्फ ग्यारह मुल्कों की पुलिस ढूँढ़ रही थी, यहाँ तो सारी दुनिया कोरोना के पीछे लगी है। लेकिन मजाल जो किसी के हाथ आ जाए। न्यूयार्क में काम करने वाले एक वेटर से लेकर, बेंगलूर के मजदूर, तेलंगाना के किसान, कुवैत के नाई तक इसकी मार झेल चुके हैं। इसका आतंक सभी भेदभावों से ऊपर है। यह अमीर से लेकर गरीब तक पढ़े से लेकर अनपढ़ तक सबको अपने चंगुल में फँसा रखा है। बड़े देश होने का ढींग हाँकने वाले भी आज इसके सामने नतमस्तक हैं। इसकी बेरहमी के आगे देश के आलाकमान खून के आँसू रो रहे हैं। ऐसी छटपटाहट इससे पहले कभी नहीं देखी गयी थी।

चीन के किसी कोने में जन्म लेने वाले महाप्रभु कोरोना जी को पहले हमने हल्के में लिया था। हमने सोचा यह हमारा क्या बिगाड़ लेगा। चीन तो चीन है। दुनिया की सबसे बड़ी दीवार उसके पास है। यही कारण है कि उसने जैसे-तैसे अब इस महामारी की रोकथाम के लिए अपने हिसाब से दीवार बना ली है। उनके पास इस महामारी का प्रभाव अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। लगता है अपने जन्मदाता से इसका मन उबिया गया है। इसीलिए देशभ्रमण पर निकला है। अब श्री श्री श्री कोरोना जी दुनिया भर में अपनी क्रूरता का तांडव बेखौफ दिखा रहे हैं। इटली, इरान, स्पेन जैसे देशों में इसका महाकाल मृत्यु तांडव बेरोकटोक चल रहा है।

श्री श्री श्री कोरोना जी बड़े चमत्कारी हैं। उनका चमत्कार ही है कि अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव तो भारत गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, सांप्रदायिक हिंसाएँ, भ्रष्टाचार सब कुछ भूल चुका है। हर दिन सुर्खियों में रहने वाला सीरिया दूरियाँ बनाए रखा है। इरान राजनीति छोड़ जनता की आपबीति में व्यस्त है। हर दिन जेहाद…जेहाद करने वाले अब कोरोना-कोरोना का जप कर रहे हैं। यदि कोरोना से कोई नहीं डरा है तो वह है – पाकिस्तान। वह अब भी कोरोना महामारी के बीच कश्मीर-कश्मीर चिल्ला रहा है। सारी दुनिया एक तरफ पाकिस्तान की सोच एक तरफ।

विश्वयुद्ध के समय भी संकट का ऐसा मंजर नहीं था। सारे देश ऐसोलेशन में ढकेल दिए गए हैं। पार्कों में लोग तो छोड़ो चींटियाँ भी आने से कतरा रही हैं। मंदिर-मस्जिद-गिरजाघर-गुरुद्वारा सभी बंद पड़े हैं। सिनेमा देखने वाले तो दूर सिनेमा बनाने वाले भी नदारद हैं। अब न कोई आयोजन है न कोई उत्सव। रंगीन दुनिया में कोरोना की बदरंग स्याही एक नया इतिहास लिख रही है। वह दिन दूर नहीं जब हमारी किताबों में श्री श्री श्री कोरोना महाराज जी का गुणगान लिखा जाएगा। परीक्षा में इनकी महत्ता के बारे में पूछा जाएगा। जय हो श्री श्री श्री कोरोना महाराज की!

यह किसी एक की पीड़ा नहीं है। अमेरिका के किसी एक कोने में लॉकडाउन करने पर भारत में कई लोगों की नींद हराम हो जाती है। पहले कहीं किसी कोने से किसी के मरने की खबर आती थी तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब हालात यह है कि हमारी सिसकियों में हमारा डर दिखायी देता है। कहीं किसी की माँ तो कहीं बच्चे रात-रात भर बेचैनी से रो-रोकर जिंदगी गुजारने के लिए आमदा हैं। आज यह महामारी आर्थिक रूप से हमें कमजोर करता जा रही है। इसी बीच लालची दानवी प्रवृत्ति वाले व्यापारी कालाबाजारी के नाम पर भयग्रस्त भोले-भाले लोगों को लूट रहे हैं। आर्थिक परिस्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। दैनिक भत्ते वालों की जिंदगी तो और बदहाल है। कोरोना की महामारी ने देश का नहीं, सामान्य लोगों की जिंदगी का लाकडाउन किया है। मंजर यह है कि किराया न देने पर मकान मालिक घर खाली करवा रहा है। सड़क पर यात्री न होने से भाड़े पर वाहन चलाने वालों की हालत खस्ता हो रही है। वैसे भी देश में हर दिन 35 करोड़ लोग बड़ी मुश्किल से एक जून की रोटी जुटा पाते हैं। अब कोरोना के चलते वह रोटी भी दूर हो गयी है। ऐसे में अपराध नहीं बढ़ेंगे तो और क्या होगा?

व्यापार नहीं होगा तो जीएसटी आय नहीं होगी। धन नहीं होगा तो सरकारें ठीक से काम नहीं करेंगी। परिणामस्वरूप इसका बोझ कर्मचारियों को उठाना पड़ेगा। जो महानगर छोटे-छोटे गाँवों से आए लोगों के लिए रोजगार का केंद्र बनते थे, वही आज सबसे पहले लाकडाउन का शिकार हो रहे हैं। छोटी-छोटी जिंदगियाँ अपने-अपने गाँव खाली पेट का बोझ उठाए वापस लौट रही हैं। आए दिन हथियार के बल पर दुनिया को डराने वाला अमेरिका घुटनों के बल रेंग रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति कोरोना के डर के मारे दिन में कइयों बार हाथ धो रहे हैं। चुनाव तो दूर दूसरों से मिलने का साहस भी नहीं कर पा रहे हैं।

मनुष्य को स्वयं की शक्ति पर बड़ा अहंकार है। अहंकारी मनुष्य को उसकी औकात दिखाने में श्री श्री श्री कोरोना जी ने कोई कसर नहीं छोड़ा है। प्रकृति के प्रकोप ने मनुष्य के स्वार्थ को ऐसा तमाचा मारा है कि जिसकी गूँज आने वाली कई सदियाँ याद रखेंगी। प्रकृति का एक ही नियम है- जियो और जीने दो। किंतु मनुष्य अपनी भूख के लिए चूहे, बिल्ली, चमगादड़, झींगुर, मेंढ़क जैसे प्राणियों का सेवन कर प्रकृति के पेट पर लात मार रहा है। अब बारी प्रकृति की है। इसकी लात से बचना किसी के बस की बात नहीं है। मनुष्य को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह धरती जितनी उनकी है उतनी है अन्य प्राणियों की। घोंसला बनाने की जद्दोजहद लेकर भटकने वाली चिड़िया को भी इस धरती पर जीने का पूरा अधिकार है। उसे हमारी तरह जमीन का धंधा करना नहीं आता। उसके लिए धरती धंधा नहीं माँ है, और माँ के साथ कोई धंधा नहीं करता। विकास के नाम पर असंख्य पेड़ काटे जा रहे हैं। उन पेड़ों में असंख्य प्राणियों की जिंदगियाँ नेस्तनाबूद हो रही हैं। आज एक चींटी या गिलहरी अपने ढंग से जिंदगी नहीं जी पा रही हैं। उन्हीं का श्राप कहिए या फिर हमारी करतूत…जिसके कारण जन्म हुआ है श्री श्री श्री कोरोना महाराज का। हाँ एक बात और, यह जो हर दिन हाथ धोने – साफ करने, नाक-मुँह ढकने, नमस्ते करने का नाटक करते हो उससे कुछ दिन के लिए तो बच जाओगे, लेकिन सच्चे मायनों में स्वयं को सुरक्षित रखना चाहते हो तो सबसे पहले अपना मन साफ रखिए, नाक-मुँह को नहीं अपने लालच को ढकिए। हाथ जोड़कर नमस्ते करने से अच्छा है प्रकृति की सुरक्षा के लिए हम सब एक-एक कर प्रकृति की सुरक्षा के लिए हाथ बढ़ाएँ।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

 

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar