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व्यंग्य : पढ़े-लिखे इंसान नहीं शैतान कहो

दिल्ली में भड़की हिंसा पर व्यंग्य लेख

 खून…खून…खून…खून! जहाँ देखो वहाँ खून ही खून। पूर्वी दिल्ली के मौजपुर और जाफराबाद सुर्खियों में थे। दंगे हिंदू-मुस्लिम के नाम पर हो रहे थे। लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो चुके थे। टी.वी. चैनल, समाचार पत्र इन्हीं दंगाई समाचारों से भरे पटे थे। ताजा खबर के तौर पर मृतकों की संख्या बार-बार दिखायी जा रही थी। कोई चैनल एक संख्या दिखाता तो कोई एक। कल तक जीते जागते ये इंसानी पुतले कब संख्या में तब्दील हो चुके थे, यह पता ही न चला। गुरु तेग बहादुर, लोकनायक, जगप्रवेश चंद्र अस्पताल के बाहर हजारों की संख्या में भीड़ अपने जिगर के टुकड़े से मिलने के लिए मारा-मारी कर रहे थे। मरने के बाद भी राजनीति होती रही। आरोप-प्रत्यारोप का खेल बड़े जोर-शोर से चल रहा था। सियासी छींटाकशी के बीच चरित्र दागदार हो रहे थे। किस पर विश्वास करें किस पर नहीं, यह निर्णय कर पाना दुष्कर हो गया था।

दूसरी ओर, दिल्ली के दूसरे कोने में एक रिटायर हो चुके गुमनाम मास्टर सरदयाल माथे पर हाथ धरे गहरी चिंता में डूबे हुए थे। वे यह सोच-सोचकर सहम जाते कि एक इंसान दूसरे इंसान का दुश्मन कैसे बन सकता है? खून की प्यास में इतना जघन्य अपराध कैसे कर सकता है? क्या मानवता धरती से गुम हो चुकी है? क्या यही अंधेरा हमारे देश का भविष्य है? एक-दूसरे की सहायता करने वाले हाथ क्या पत्थर, चाकू, तलवार, बंदूक ही उठायेंगे? क्या इन्होंने स्कूलों में यही सीखा था? किताबों में यही पढ़ा था? कहाँ गई उनकी सोचने-समझने की शक्ति? जिन हाथों ने कलम पकड़ा था उन्हें हथियार पकड़ने में शर्म नहीं आती? यही सब सोचते-सोचते वे उठे। नजर फिराई तो उनकी नजर पुस्तकों से भरी अलमारी पर जा टिकी। इनमें कई सारी किताबें उनके शिक्षकीय जीवन की थीं। पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक की सभी पुस्तकें संभालकर रखी थी। वे पुस्तकों को अपने घर का सदस्य मानते थे। या यूँ कहिए कि अपने बच्चों सा प्यार करते थे। इन्हीं किताबों में उनकी सारी यादें बसी हुई थीं।

अगले दिन मास्टर सरदयाल ने अपनी निजी डायरी से अपने छात्रों के मोबाइल नंबर ढूँढ़ निकाले। अब वे छात्र बड़े हो चुके थे। अच्छी-अच्छी नौकरियाँ कर रहे थे। अमूमन सभी अपने-अपने जीवन में व्यस्त थे। किंतु अपने प्रिय शिक्षक के बुलावे को मना न कर सके। सभी नियत समय पर मास्टर जी के घर पहुँचे। सभी छात्रों में एक अजीब जिज्ञासा थी। वे जानना चाहते थे कि आखिरकार मास्टर जी ने उन्हें क्यों बुलाया? जैसे ही मास्टर जी हॉल में पहुँचे सभी छात्र छोटे बच्चों की तरह खड़े होकर अभिवादन किया। मास्टर जी को पुराने दिन याद आ गए। इशारे से सभी को बैठने और मेज पर रखी पुस्तकें लेकर पढ़ने के लिए कहा। छात्रों को यह सब कुछ अजीब लग रहा था। फिर भी बचपन में पढ़ी किताबों को एक बार फिर से देखकर उन्हें भी बड़ी खुशी हुई। किताबों में उनका बचपन साफ दिखाई दे रहा था।

मास्टर सरदयाल ने करीब आधे घंटे बाद सभी छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, “मेरे प्यारे छात्रों! आप सभी को यह जानने की बड़ी इच्छा होगी कि आप लोगों को यहाँ क्यों बुलाया गया है? बात यह है कि रिटायरमेंट के पाँच साल बाद आज मुझे लगता है कि मैंने जो कुछ पढ़ाया वह सब बेकार हो गया है।” मास्टर जी की बात को बीच में काटते हुए एक छात्र ने कहा, “नहीं मास्टर जी। आप ऐसा क्यों समझते हैं? आज आपकी बदौलत ही हम सब इतनी अच्छी स्थिति में हैं। बचपन में आपके पढ़ाए पाठ हमें आज भी याद है। आपने बचपन में हमें सिखाया था- हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं…., जग में सबसे न्यारा देश / अपना प्यारा देश / हिंदू मुस्लिम सिख इसाई / कि आँखों का तारा देश… आज भी आए दिन ये गीत, कुछ कहानियाँ, आपके चुटकुले हमें बरबस याद आते रहते हैं।” शेष छात्रों ने भी उस छात्र की बात से सहमति जताई।

न जाने क्यों मास्टर जी छात्रों की बातों से नाराज़ हो गए। छात्रों ने सोचा शायद मास्टर जी उनकी बातों से अपने पुराने दिन याद करेंगे और अपने जीवन के सुनहरे पलों की मीठी-मीठी अनुभूतियों को हमारे साथ साझा करेंगे। मास्टर जी ने सभी छात्रों को फिर से संबोधित करते हुए कहा, “यह कार्यक्रम उन सभी शिक्षकों और छात्रों के लिए तमाचा होना चाहिए जिन्हें लगता है कि शिक्षा से समाज में परिवर्तन आ सकता है। कहते हैं कलम में हथियार से लाख गुना अधिक शक्ति होती है। लेकिन आज पूर्वी दिल्ली में जो हो रहा है, उसका जिम्मेदार आज का शिक्षित समाज ही है। पढ़े-लिखे शैतानों द्वारा भड़काई हिंसा ने सामान्य लोगों की जान ले ली। किसी से किसी का दिल का टूकड़ा दूर हुआ है तो किसी से उसके घर का सहारा। नन्हीं आँखों से उनके सपने छीन लिए गए। किताबों में हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं…जैसे गीत पढ़ने मात्र से कुछ नहीं होता। यह सच है कि ये किताबें गीता-कुरान से अधिक मूल्यवान हैं। इन्हीं से हम पढ़ना-लिखना और जीवन की तैयारी करना सीखते हैं। दुर्भाग्यवश किताब की बातें किताब तक ही सीमित रह गईं। इन्हें हमने आम जीवन में नहीं उतार पाया। क्या लाभ ऐसी किताबों का जो हमारे ऊँच-नीच, जात-पात, भेदभाव, छूत-अछूत जैसे सामाजिक बुराइयों को दूर नहीं कर सकतीं? इसीलिए मैं आप सभी के सामने बाहर जल रहे कचरे की आग में इन किताबों की आहूति देता हूँ। मुझे नहीं चाहिए ऐसी किताबें जो इंसान को इंसान नहीं बना सकतीं।” यही सब कुछ कहते-कहते मास्टर सर्वदयाल उठे और सारी किताबें आग की लपटों में झुलसने के लिए फेंक दी। सभी छात्र जो अपने आपको पढ़ा-लिखा आश्चर्यार्थक चिह्न समझते थे, आज वे सिर झुकाये प्रश्न चिह्न सा प्रतीत हो रहे थे।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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