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व्यंग्य : सोशल मीडिया विश्वविद्यालय बनाम आजकल के विश्वविद्यालय

आज के समय का सबसे तेज़ी से दिन दुनी रात चौगुनी विकास करने वाला कोई विश्वविद्यालय है, तो वह है– सोशल मीडिया विश्वविद्यालय। हाँ जनाब, यह दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। विश्वास न हो तो स्वयं को ही देख लो। आपका सबसे अधिक समय इसी पर व्यतीत होता है। इस विश्वविद्यालय का जुनून तो अब लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। इस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले इतने समर्पित हैं कि इसके चक्कर में घर-बार, रिश्ते-नाते, सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। हाँ एक बात और, यह विश्वविद्यालय दिन के चौबीसों घंटों, सप्ताह के सातों दिन, महीने के तीसों दिन और साल के 365 दिन खुला रहता है। यह ऐसा विश्वविद्यालय है जो आपको कभी ऊबने नहीं देता। आपको हँसाने, रुलाने, बहलाने, सुनाने, दिखाने सब के लिए हमेशा मुश्तैद रहता है। अब तो दुनिया एक ही मंत्र का जाप करती है- सोशल मीडिया, सोशल मीडिया और सोशल मीडिया! ! !
सोशल मीडिया विश्वविद्यालय और आजकल के विश्वविद्यालयलों में जमीन-आसमान का अंतर है। आजकल के विश्वविद्यालयों को चलाने के लिए जहाँ विज्ञापन की आवश्यकता पड़ती है वहीं सोशल मीडिया विश्वविद्यालय का नशा आपको किसी नशेड़ी की तरह अपनी ओर खींचता रहता है। । आजकल के विश्वविद्यालयों में जहाँ एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी रहती है, वहीं सोशल मीडिया विश्वविद्यालय का किसी से कोई होड़ नहीं। न तो इसे चमक-धमक वाले विज्ञापनों की आवश्यकता है और न ही बड़े-बड़े पोस्टरों की। यह तो होड़ की मोहमाया से मुक्त है। आजकल जहाँ विश्वविद्यालय अपनी पहचान बनाए रखने के लिए इधर-उधर की धूल फाँक रहे हैं, वहीं सोशल मीडिया विश्वविद्यालय दूसरों को धूल फँका रहे हैं। इस विश्वविद्यालय के संचालन लिए आजकल के विश्वविद्यालयों की तरह बड़ी-बड़ी कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, मैदानों, मनोरंजक स्थलों की कोई आवश्यकता नहीं है। सोशल मीडिया विश्वविद्यालय तो एक अलग ही दुनिया है। इस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों में लिंग, धर्म, जात-पात, ऊँच-नीच, आयु, भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति जैसा कोई अंतर देखने को नहीं मिलता। सच तो यह है कि सोशल मीडिया विश्वविद्यालय न केवल भारतीय संविधान बल्कि दुनिया के सभी संविधानों के उद्देश्यों को एक साथ पूरा करने का दमखम रखता है। वहीं आजकल के विश्वविद्यालयों में यह बात कहाँ है? ये सभी एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। इन विश्वविद्यालयों में आए दिन लिंग, धर्म, जात-पात, ऊँच-नीच, आयु, भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति और न जाने किन-किन बातों को लेकर कुछ-न-कुछ अनबन देखने को मिलता रहता है। इनमें हमेशा तू-तू-मैं-मैं होता रहता है। वहीं सोशल मीडिया विश्वविद्यालय नेतृत्व क्षमता में सबसे आगे रहता है। इसका साक्षात प्रमाण निर्भया, दिशा जैसे आंदोलन ही हैं। यदि सोशल मीडिया विश्वविद्यालय न होता तो ये पुलिसथाने, कचहरी, संवैधानिक सभाएँ हमारी एक न सुनतीं। वह तो भला मनाइए कि इस विश्वविद्यालय के कारण कामचोरों, रिश्वतखोरों, बलात्कारियों में थोड़ा-बहुत डर बैठा हुआ है। वरना हमारा दाना-पानी कब का उठ गया होता।
आजकल के विश्वविद्यालय हमें मात्र ज्ञान बाँचने का काम करते हैं। यह काम तो सुबह-सवेरे हर टी.वीं चैनल में बैठे बाबा लोग भी करते हैं। ऐसे में इन विश्वविद्यालयों का क्या लाभ? वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया न केवल ज्ञान बाँटते हैं (इस ज्ञान की गुणवत्ता को परखने के लिए पढ़ा-लिखा होने के साथ-साथ तर्क-वितर्क करने की क्षमता भी होनी चाहिए) बल्कि प्रश्न करना भी सिखाते हैं। ये वहीं विश्वविद्यालय हैं जो नेताओं के झूठे वायदों को बार-बार दिखाकर उनकी नींद हराम कर देती है। बैंकों की राशि हजम करने वालों तथा भगोड़ों को बार-बार भागता दिखाकर दूसरों को भागने से सचेत करता है। सोशल मीडिया विश्वविद्यालय चाहें तो किसी को अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श तक पहुँचा सकते हैं। सामान्य शब्दों में इसे ही ‘वायरल’ कह सकते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि इस विश्वविद्यालय में अच्छाई और बुराई दोनों की शिक्षा मिलती है। यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम किसमें निपुण बनना चाहते हैं।
अब तो दुनिया भर के देशों ने इस विश्वविद्यालय का लोहा मान लिया है। यही कारण है कि आजकल के विश्वविद्यालयों में सरकारें रोजगार दें न दें, लेकिन आई.टी. सेल के बहाने सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में लाखों की संख्या में रोजगार दिए जा रहे हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि सोशल मीडिया विश्वविद्यालय का मुरीद पक्ष-विपक्ष दोनों हैं। अब सियासी, बयानी तथा सभी तरह के जंगों का अखाड़ा सोशल मीडिया विश्वविद्यालय ही है। इस विश्वविद्यालय में जो सबसे आगे निकलता है जीत उसी की मानी जाती है। पहले यह काम आजकल के विश्वविद्यालय ही करते थे, किंतु एक सीमा के भीतर।
सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में आजकल के विश्वविद्यालयों की तरह सभी संकाय होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जो विषय आजकल के विश्वविद्यालयों में नहीं मिलते वे सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में मिल जाते हैं। कला, वाणिज्य, विज्ञान विषयों के ज्ञान देने में जहाँ आजकल के विश्वविद्यालयों की नानी याद आ जाती है। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया विश्वविद्यालय किसी भी विषय के ज्ञान को धड़ल्ले से बाँचते हैं। और तो और, इस विश्वविद्यालय में सामान्य विश्वविद्यालयों की तरह समय-सीमा, मोटी-मोटी फीस और प्रवेश के चोंचले नहीं होते। सोशल मीडिया विश्वविद्याय अत्यंत सुविधाजनक होते हैं। आप चाहें तो किसी भी विषय का ज्ञान झट से प्राप्त कर सकते हैं। यहाँ तक कि बिना एम.बी.बी.एस. पढ़े इस विश्वविद्यालय से प्रसूति चिकित्सा कर सकते हैं। हाँ यह अलग बात है कि ये चिकित्साएँ कभी-कभी फेल हो जाती हैं। किंतु इतने मात्र से इस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले घबराते नहीं है। बल्कि दुगने जोश के साथ असंभव कार्य करने का जोश दिखाते हैं।
सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में पढ़ने वालों में हमेशा ‘मैं’ की होड़ लगी रहती है। वे इसी होड़ में आजकल के विश्वविद्यालयों के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर देते हैं। सामान्य विश्वविद्यालयों में ज्ञान बाँचने का जिम्मा कुछेक लोगों (प्रोफेसर) के हाथ में होता है, वहीं सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में ज्ञान बाँटने वाला कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा हो सकता है। कमाल की बात तो यह है कि यही ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे कहलाने वाले लोग प्रोफेसरों से दो क़दम आगे निकल जाते हैं। सोशल मीडिया में ज्ञान की नहीं बात मनवाने की कला की प्रशंसा होती है। यह विश्वविद्यालय चाहे तो सार्वभौमिक सत्य जैसे दिन-रात, सूरज-चाँद, स्त्री-पुरष के गुण यूँ बदलकर आपके सामने ऐसा परोसेंगे कि आप विश्वास किए बिना रह नहीं पायेंगे। इस विश्वविद्यालय में इतनी क्षमता है कि वह सूरज को ठंडा, चाँद को गर्म, दिन को रात, रात को दिन, स्त्री को पुरुष और पुरष को स्त्री बना दे।
आजकल के विश्वविद्यालय में पढ़कर नाम कमाना सबसे कठिन कार्य है। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में जो एक से बढ़कर एक ऊट-पटांग, अनाप-शनाप, अच्छा-बुरा समाचार फैलाने की कला में माहिर होता है वह रातोंरात सुपर-स्टार बन जाता है। मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता बनने में बहुत समय लग गया। यदि उनके समय में सोशल मीडिया होता तो शायद वे कुछ और होते। जनाब यह सोशल मीडिया सामान्य से जीवन बीमा कर्मचारी को कल्की भगवान बनाकर अरबों का रुपया दे सकता है। यदि है आपके पास सोशल मीडिया विश्वविद्यालय में पढ़ने की कला, तो यह विश्वविद्यालय आपके लिए बना है। इस विश्वविद्यालय में आपके उठने-बैठने, खाने-पीने, पढ़ने-लिखने जैसी सभी तरह की छूट है। जब मन चाहा तब इस विश्वविद्यालय में हो लिए नहीं तो बाहर आ गए। यह विश्वविद्यालय आपके माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी या अन्य लोगों की तरह नहीं है। ये लोग बात-बात पर हँसी-खुशी, रोने-धोने, डाँटने-फटकारने, डराने-धमकाने पर उतर आते हैं। ये लोग आपकी बात सुनेंगे या नहीं इसकी मैं कोई गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन सोशल मीडिया विश्वविद्यालय आपके इशारों पर नाचेगा, इतनी तो गारंटी दे सकता हूँ।
अब बताइए, है न यह बढ़िया विश्वविद्यालय! ऐसा विश्वविद्यालय तो आपको स्वर्ग में भी नहीं मिल सकता। वास्तव में किसी भी विश्वविद्यालय का उद्देश्य मनुष्य को ज्ञानी बनाना नहीं है, बल्कि जीवन की तैयारी करवाना है। उसे जीवन जीने की कला सिखाना है। क्या यह कला सोशल मीडिया विश्वविद्यालय नहीं सिखा सकता है? अवश्य सिखा सकता है। आजकल के विश्वविद्यालय सरकारों के बदलते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। कहीं पाठ्यक्रम के नाम पर तो कहीं पुस्तकों के नाम पर तो कहीं कुछ! कहीं कुछ! कहीं कुछ! सच तो यह है कि आजकल के विश्वविद्यालयों का भविष्य सोशल मीडिया विश्वविद्यालयों की मुट्ठी में बंद है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]

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