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पानी कुछ कहना चाहता है…

22 मार्च – विश्व जल दिवस के अवसर पर वैचारिकी


मैं पानी हूँ। हर जिंदगी की कहानी हूँ। किसी का अफसाना तो किसी का तराना हूँ। आपके शरीर में 70 प्रतिशत का मालिक हूँ। मैं हर जगह हूँ। पाताल से लेकर अंबर तक, सूक्ष्म से लेकर स्थूल तक, हर कण में बसा हूँ। हवा में भाप, जमीन में तरल और ठोस में बर्फ बनकर आपके चारों ओर हूँ। रूप अलग-अलग हैx। काम केवल एक है- हर जरूरतमंद के काम आना। कहने को तो सारा समुंदर इंसान के पास है, लेकिन एक बूँद उसकी प्यास है। मैं वहीं बूँद हूँ। मैं वही आस, मैं वही विश्वास हूँ।
महासागर पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई भाग घेरे हुए हैं, लेकिन पृथ्वी पर मेरी उपलब्धता मीठे जल के रूप में केवल 2.7 प्रतिशत ही है और इसमें से भी लगभग 75.2 प्रतिशत धुव्रीय प्रदेशों में बर्फ के रूप में विद्यमान हूँ और 22.6 प्रतिशत भूजल के रूप में। शेष जल तालाबों, झीलों, नदियों, वायुमंडल, नमी, मृदा और वनस्पति में मौजूद हूँ। बड़ी मुश्किल से आपके पास आते-आते एक प्रतिशत रह जाता हूँ। इसी में किसी की प्यास बुझती है तो किसी का खाना पकता है। किसी के कपड़े धुलते हैं तो किसी के बर्तन मँजते हैं। किसी के घर बसते हैं तो किसी के उद्योग चलते हैं। किसी के खेत लहलहाते हैं तो किसी के पेड़-पौधे मुस्कुराते हैं। मेरे जीवन का एक ही फंडा है, जो नहीं है उसके लिए रोना क्या? जो है उससे बढ़कर और क्या! किसी की साँस बनकर, खुशी के आँसू बनकर जीने का जो मज़ा है वह कहीं नहीं मिल सकता।
एक जमाना था जब मैं जमीन के भीतर मात्र 15 फुट की गहराई में दर्शन दे देता था। अब एक जमाना यह भी है कि 1000 फुट की गहराई से पहले दर्शन देना मेरी शान के खिलाफ है। क्या सिर्फ इंसान ही रंग बदलते हैं? कतई नहीं। मुझे ही देख लो। अगर मैं अपने पर आ जाऊँ तो कहीं अकाल तो कहीं बाढ़ बनकर तबाही मचा सकता हूँ। लेकिन मैं इतना भी गया गुजरा नहीं हूँ कि किसी के आँसुओं से अपना घर साफ करूँ। मैं पानी हूँ पानी! किसी के इशारे पर नाचने वाला गुलाम नहीं। जो मेरा सम्मान करेगा मैं उसका सम्मान करूँगा। मैं एक हाथ दे एक हाथ ले वाली नीति में विश्वास करता हूँ। जो मेरी रक्षा करेगा, मैं उसकी रक्षा करूँगा। मैं जहाँ हूँ वही हरियाली है। मैं जहाँ नहीं हूँ वहाँ रेगिस्तान, सूखा, भुखमरी, विलाप, विषाद और जीवन का मृत्यु तांडव है। अब निर्णय आपको करना है कि आपको क्या चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी ने 1999 में एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया था कि पचास देशों में 200 से भी अधिक वैज्ञानिकों ने मेरी कमी को नई शताब्दी की दो सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बताया था। दूसरी समस्या धरती का बढ़ता तापमान थी। आप अपने पास उपलब्ध मेरी मात्रा का 70 प्रतिशत खेती-बाड़ी में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन विश्व जल परिषद का मानना है कि सन् 2020 तक पूरी दुनिया को खाना खिलाने के लिए आपको अभी विद्यमान मेरी मात्रा नाकाफी है। इसके लिए अतिरिक्त 17 प्रतिशत की आवश्यकता पड़ेगी। यदि आप इसी ढर्रे पर चलते रहे तो आने वाले दिनों में आज के मुक़ाबले ऐसे लाखों लोग ज़्यादा होंगे जो हर रात सोते वक्ते भूखे-प्यासे होंगे। आज पूरी दुनिया में हर पाँच में से एक आदमी को पीने के मेरी सुविधा नही है। हर दो में से एक को साफ़-सुधरे शौचालय की सुविधा नहीं है। प्रतिदिन लगभग तीस हज़ार बच्चे पांच साल की उम्र पूरी कर पाने से पहले ही मर जाते हैं। इनकी मौत या तो भूख से या फिर उन बीमारियों से होती हैं जिनकी आसानी से रोक-थाम की जा सकती थी। मेरा शुद्ध रूप अच्छी सेहत और खुराक का मूलमंत्र है।
आप सभी जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में घोषित किया है। यह मुझ पर कोई अहसान नहीं है। सबसे पहले तो यह एक दिन का गाना-बजाना, बड़ी-बड़ी हाँकना, देख-दिखावा, नाटक और नौटंकी बंद करें। मैं आपकी मीठी-मीठी चुपड़ी-चुपड़ी बातों में नहीं आने वाला। दूसरी बात, जो मुझे बचाने के लिए आए दिन जल बचाओ – कल बचाओ, जल नहीं तो कल नहीं, जल ही जीवन है – इसके बिना सब निर्जन है, पानी हम बचायेंगे – घर-घर खुशहाली लायेंगे, जल संरक्षण है एक संकल्प – इसका नहीं है कोई विकल्प, जनहित में यह सूचना जारी – जल संरक्षण की करो तैयारी, जन-जन ने ठाना है – जल को अब बचाना है जैसे नारे लगाते रहते हैं, उसे बंद करें। इन नारों की पोटली बाँधकर कूड़े में फेंक दें। इससे कोई लाभ नहीं है। मुझे बचाने के लिए कथनी की नहीं करनी की जरूरत है।
अपने लिए मुझे बचाना है तो आप छोटे-छोटे काम जैसे- मंजन करते या मुँह धोते समय नल खुला छोड़ देना, कपड़े धोने के लिए मुझे निरंतर बहने देना, मात्रा से अधिक स्नान के लिए मेरा इस्तेमाल करना, वाहनों की धुलाई के लिए मात्रा से अधिक मेरी बर्बादी करना रोक दें, तो कइयों को जीवनदान दे सकते हैं। इसलिए समझदारी व भलाई इसी में है कि बरसात के दिनों में मुझे सहेजिए। इसके लिए कुएं, तालाब व बावड़ियां बनवाने के लिए आगे आएँ, क्योंकि ये काफी मात्रा में न केवल मेरा संग्रह करते हैं, बल्कि बारहों महीने मेरी आपूर्ति भी करते हैं। अगर आप आज नहीं जागेंगे तो आपकी भावी पीढ़ी आपको कभी माफ नहीं करेगी, क्योंकि हम विरासत में उनके लिए प्यास ही प्यास छोड़कर चले जाएंगे। हाँ यह बात अलग है कि ऐसी स्थिति में आपको कोसने के लिए न तो वह पीढ़ी रहेगी और न ही आप रहेंगे! रहीम के शब्दों में कहा जाए तो- रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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