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खेल के मैदान में सांप्रदायिकता का क्याकाम

आजकल राष्ट्रवाद,सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों पर बहस चल रही है।यहां तक कि इन तीन शब्दों से जुड़े दो मूल विचारों के बीच द्वंद्व का असर समाज पर भी पड़ रहा है।अभी तक इन शब्दों का प्रयोग राजनीति में और राजनीतिक मंचों से आमतोर पर हो रहा था।सियासी दल अपने-अपने हिसाब से राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषाएं गढ़ रहें हैं।तो इसे सियासत समझ कर उसी तरह से तवज्जो भी नही दिया जा रहा जाता रहा है।लेकिन अब खेल के मैदान में भी साम्प्रदायिकता जैसे शब्द का प्रयोग किया जा रहा है,जो अच्छा संकेत नही है।दरअसल भारत विभिन्नता में एकता वाला देश है।यहां हर मजहब के लोग रहते हैं,लेकिन कुछ लोगों का एजेंडा मजहब के नाम पर नफरत फैलाने का भी हैं।आगे बढ़ने से पहले यहां ये समझ लेना भी जरूरी है कि धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचा का हिस्सा है यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने अपने एसआर बोम्मई बनाम भातीय संघ में दिया है।अगर गम्भीरता से गौर किया जाये तो वास्तव में धर्निर्पेक्षता और सांप्रदायिकता एक विश्वासों और आस्थाओं के रूप में इंसानों के बीच एक दीवार बनाती है और चूँकि इंसान तर्कशील प्राणी है तो हितों के देखते हुए दीवार को कभी छोटा और बड़ा कर लेता है।भारत में खेल के मैदान या खिलाड़ी का धर्मों से दूर दूर तक सम्बंध नही है।लेकिन देश के पूर्व सलामी बल्लेबाज वसीम जाफर और उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन के बीच ताजा विवाद में साम्प्रदायिकता जैसे शब्दों का प्रयोग उन तमाम लोगों के माथे पर बल डालने वाला है,जो क्रिकेट खेल से बेपनाह मोहब्बत करते हैं और खिलाड़ियों को भगवान की तरह मानते हैं।खेल के मैदान में,वह भी क्रिकेट में सांप्रदायिकता का विवाद?ये सवाल अजीब है,लेकिन उत्तराखंड क्रिकेट में यही आरोप लग रहा है।आज भारत क्रिकेट की शक्तिपीठ है और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया के पूरे क्रिकेट तंत्र को अपने इशारों पर नचाने की हैसियत रखता है।जो लोग खेल में धर्म की राजनीति को सीधे प्रवेश कराने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं,उनके लिए ये बात गौरकरने की है कि हिन्दी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा,यही सच है और इस सच को कोई झुठला नहीं सकता।ये भी सच है कि क्रिकेट के अंदर कोई धर्म नहीं होता है।क्यों कि क्रिकेट अपने आप में किसी धर्म से कम नही है,खिलाड़ियों का धर्म भी क्रिकेट है।ये तथ्य है कि हिंदुस्तान में जबसे क्रिकेट शुरू हुआ है,तब से सभी धर्मों के लोग खेले हैं और हिंदुस्तानी क्रिकेट में धर्म के आधार पर कभी तरजीह नहीं दी जाती है।अगर दी जाती तो सन 1932 के पहले टेस्ट मैच में मोहम्मद निसार और जहांगीर खान जैसे खिलाड़ियों से शुरू होने वाला ये सिलसिला आज 90 साल बाद तक मोहम्मद सिराज और शहबाज नदीम तक बिना रोक टोक न चलता।देश के पहले टेस्ट मैच में 93 रन देकर पांच विकेट लेने वाले मोहम्मद निसार की तेज गेंदबाजी बरसों तक भारतीय तेजगेंदबाजों के लिए आदर्श न होती।देश के लिए पहला टेस्ट शतक लगाने वाले सै मुश्ताक अली को पद्श्री जैसा प्रतिष्ठित सम्मान न मिलता और उनके नाम पर देश में एक टुर्नामेंट न शुरू किया जाता।क्रिकेट में इस तरह से मजहब के नाम पर भेदभाव के आरोप काफी खतरनाक हो सकते हैं?क्योंकि कि खेल वो इकलौता प्लेटफॉर्म हैं जहां पर धर्म के आधार पर किसी को परखा नहीं जाता है।आपको याद होगा कि पहले पाक से तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक तौर पर क्रिकेट सीरीज आयेजित की जाती थी।बहुत पीछे जाने या दिमाग पर जोर देने की जरूरत नही है हाल में ही ऑस्ट्रेलिया में जब मोहम्मद सिराज को नस्लभेदी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा तो सारा भारत एक था।कप्तान सहित पूरी टीम ने एक साथ सिराज का साथ दिया था।तब किसी ने उस समय उनका धर्म नहीं देखा था।काबिलेगौर है कि आईपीएल के दौरान कई बार धर्मशाला में मैच से पहले दलाई लामा खिलाड़ियों को आशीर्वाद देते थे।तब किसी ने सवाल नही उठाया कि क्रिकेट के मैदान में किसी धर्म के मुखिया का क्या काम है?क्योंकि खेल के मैदान में खिलाड़ी का खेल और उसका जुनून ही महत्पूर्ण होता है।वसीम जाफर भारतीय क्रिकेट का जाना-पहचाना चेहरा और बड़ा नाम है।टेस्ट क्रिकेट में उनके रिकार्ड भले ही उनकी प्रतिभा के अनुकूल न हों लेकिन रणजी ट्राफी और घरेलू क्रिकेट में उनका प्रदर्शन भारत के नामी और सफल खिलाड़ियों से बेहतर है।यानी वसीम जाफ़र ने घरेलू क्रिकेट में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है।रणजी से लेकर ईरानी ट्रॉफी में उनके पास बेहतरीन प्रदर्शन करने के रिकॉर्ड हैं।रणजी में सबसे पहले 12 हज़ार रन बनाने से लेकर सबसे ज़्यादा 40 शतक लगाने का रिकॉर्ड भी वसीम जाफ़र के ही नाम है।मुंबई और विदर्भ की तरफ से खेल चुके वसीम जाफ़र 150 से ज़्यादा मैच खेलने वाले पहले खिलाड़ी भी हैं।उनके प्रदर्शन के बल पर ही विदर्भ जैसी टीम रणजी चैम्पियन बनी थी।रिकार्ड ही खिलाड़ी की प्रतिभा की गवाही देते हैं।वसीम जाफर का एक और रिकार्ड देखिए,उन्होने 260 मैचों में 50.67 की औसत से 19,410 रन बनाए इसमें 57 शतक और 91 अर्धशतक शामिल हैं।एक खिलाड़ी के रूप में अपना शानदार प्रदर्शन दिखाने के बाद वसीम जाफ़र ने एक कोच के रूप में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। लेकिन उत्तराखंड क्रिकेट टीम के कोच के रूप में इस्तीफ़ा देने के बाद उन पर सांप्रदायिकता फैलाने के आरोप लगा गए,स्थानीय मीडिया में इस संबंध में रिपोर्टें छपी और वसीम जाफ़र की प्रतिक्रिया के बाद मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया।हांलाकि क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ उत्तराखंड ने सारी बातों को सिरे से खारिज किया है।लेकिन सवाल यही उठ रहा है कि फिर ये आरोप कहां से उपजे और खबरों की सुर्खी कैसे बने?मजेदार बात ये है कि सघं की एपेक्स काउंसिल में भी किसी तरह की शिकायत दर्ज नही करायी गई।विवाद की जड़ में कहां है?ये सवाल अभी भी अनुत्तरित है।इस मामले को तूल देना क्रिकेट के हित मे नही है।लेकिन वसीम जाफर को नजदीक से जानने वाले पूर्व भारतीय क्रिकेटर करसन घावरी,अनिल कुम्बले,मनोज तिवारी और इरफान पठान जैसे पूर्व खिलाड़ी इससे आहत हैं।घावरी इसे एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण लम्हा बताते हैं।मीडिया में अपने बयान में वे कहते हैं,वसीम उस तरह के लोगों जैसा नहीं है,जो इस तरह का काम करें।क्रिकेट को लेकर वे बहुत ही ईमानदार रहे हैं।वह सिर्फ़ अपनी टीम के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन चाहते हैं।वसीम जाफर की ये बात गौर करने लायक है कि मैंने इस्तीफ़ा दिया क्योंकि मैं खुश नहीं था,अगर मैं सांप्रदायिक था,तो मुझे बर्ख़ास्त किया जाता।भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कोच और क्रिकेट प्रशासकों के बीच विवाद की बहुत सी घटनाएं हैं,लेकिन ये अपने तरह का अनोखा मामला है।मेरा मानना है कि देश में धर्मनिरपेक्षता ना केवल सलामत है वरन आज भी वह उतनी ही मजबूत है जितनी आजादी आंदोलन में मजबूत थी।देश में कुछ महीने पहले कोरोना काल में बेहद स्तब्ध करने वाली और विकट संकट की परिस्थितियों में भी मानवता का बंधन बरकरार रहा।अपने जीवन को जोखिम में डाल कर मदद करने वाले हजारों हाथ उठे लेकिन उनको रंग नही मानवता ही नजर आयी।मुंबई दंगों में सुनील गावस्कर कुछ परवाह किये बिना कई जिंदगियां बचा ले जाते है।यही नही देश के तमाम मंदिरों के आसपास मुस्लिम दुकानदार और अजमेर दरगाह के आसपास हिंदू दुकानदार बिना किसी रुकावट के अपना कारोबार करते हैं।नामवर फिल्मी कलाकारों की फिल्में तभी सफल होती हैं जब उसे सब देखते है।जरा याद करिए कि नौशाद,शकील,रफी की तिकड़ी ने देश को कई यादगार भजन दिए हैं।तो हिंदू गायकों ने अल्लाह की प्रशंसा करने वाले कलाम कहे हैं।हिंदू शायरों ने उर्दू में बेमिसाल गजलें लिखी हैं।अगर हिंदू शायर अपने कलाम उर्दू को नही देते तो आज ये जबान अपनी पहचान खो चुकी होती।देश में मजबूत सूफी परंपरा है,तो अल्लाह तेरो नाम,ईश्वर तेरो नाम भजन लोकप्रिय भजन में शुमार है।यानी धर्मनिरपेक्षता,प्रजातंत्र का मूल रस है और दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।यही वजह हे कि देश के पूर्व हाकी कप्तान ज़फ़र इक़बाल भगवद गीता और ऋगवेद के भी खासे जानकार हैं।उसी तरह से पूर्व क्रिकेट कप्तान बिशन सिंह बेदी भी सभी धर्मों के ग्रंथों की समझ रखते हैं।वाराणसी वाले हाकी के ड्रिबलिंग के जरदूगर मोहम्मद शाहिद को कैसे भूला जा सकता है?खेल में जो भी कुछ भी अच्छा हो सकता है वह सब मोहम्मद शाहिद में मौजूद था।वह पाकिस्तान के खिलाफ अपना सर्वश्रेष्ठ बचा कर रखते थे।वराणसी से ही निकले छोटे कद के मोहम्मद नईम का वह शानदार गोल कैसे भूला जा सकता है जो उन्होने पाक के खिलफ ठोंक कर भारत को मैच जिताया था।बिस्मिल्लाह खान की शहनाईकी धुनें जब फिंजा में गूजंती थी तो मजहब की बंदिशें खुद तूट जाती थी।दुखद यह है कि सबसे ज़रूरी वक्त में वसीम जाफ़र को वह मदद नहीं मिली जिसकी उम्मीद एक खिलाड़ी के रूप मे उन्होने की होगी।।आपको यहां बताते चले कि देश में आजादी के पहले अंग्रेजों ने एक पंचकोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू की थी जिसमें टीमें धार्मिक आधार पर हिस्सा लेती थी,लेकिन इससे सही संदेश न मिलने के कारण इसे सन 1946 में बंद कर दिया गया था।देश में खेल के मैदान में इस तरह के धार्मिक भेदभावों के आरोप काफी गंभीर खतरे खड़ा कर सकते हैं।यह सारी गड़बड़ी इसी लिये हो रही है कि साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों की औपचारिक और अदालतों द्वारा प्रमाणित परिभाषाएँ उपलब्ध नहीं हैं।यूं तो धर्मनिरपेक्षता की कई परिभाषाएं और व्याख्याएं हैं।भारतीय सन्दर्भ में सर्वधर्म समभाव धर्मनिरपेक्षता की सबसे स्वीकार्य व्याख्या है।यानी धर्म निरपेक्षता अर्थात धर्म के मामले में तटस्थ रहने की भावना किसी के साथ कोई भेद भाव नहीं।सेक्युलरिज्म या धर्म-निरपेक्षता एक ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति की आज़ादी के सिद्धांत से उत्पन्न हुआ है।राज्य और धर्म के बीच किसी प्रकार का संबंध न होना ही धर्म-निरपेक्षता की सामान्य परिभाषा स्वीकार की जाती है।इस सिद्धांत को मानने का दावा सभी करते हैं पर क्या वास्तव में सब धर्म-निरपेक्ष हैं?ऐ सवाल अब भी खड़ा था है।

शाहिद नकवी

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