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शिक्षकों के लिए बिहार सरकार का खजाना खाली क्यों..?

जैसे ही देश में शिक्षकों के हित और सुविधाओं की बात उठाई जाती है,सरकार की तरफ से प्रतिक्रिया व्यक्त किया जाता है हमारे पास कोष की कमी है।सरकार अगर शिक्षकों की मांग को मान लेती है तो सरकार द्वारा चलाई जा रही है कल्याणकारी योजनाओं पर रोक लगाना पड़ेगा।
बिहार में पिछले पंद्रह दिनों से अधिक से लगभग चार लाख नियोजित प्राथमिक से लेकर प्लस टू तक के शिक्षक अपने मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं।लगातार धरना प्रदर्शन कर रहे हैं।जिसके कारण मैट्रिक परीक्षा भी प्रभावित हुआ।जिसे सरकार किसी तरह करवाने में सफल रही।अब मूल्यांकन कार्य बाधित है जिससे चिढ़कर सरकार शिक्षकों पर दबाव बनाने के लिए उन्हें निलंबित और बर्खास्त कर रही है।जो कहीं से नैतिक पूर्ण नहीं है।सरकार को जहां शिक्षक प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए थी वहां शुरुआत इधर से ही कानून के डंडे तहत उनके अधिकार को कुचलने का प्रयास शुरू कर दिया गया।यह किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में जायज नहीं ठहराया जा सकता।पहले से ही बिहार के अधिकतर विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है उसके ऊपर इस तरह की करवाई शिक्षा को प्रभावित करेगा।शिक्षकों की मांग है उन्हें भी अन्य नियमित शिक्षकों के समान वेतन भत्ते और अन्य सुविधाएं दिया जाना चाहिए।जो सही भी है क्योंकि इनका मांग अन्य शिक्षकों और कर्मचारियों से अधिक वेतन भत्ते और सुविधाओं की तो है नहीं।
लेकिन बिहार सरकार लगातार कई वर्षों से कहती आ रही है हमने शिक्षकों को पंद्रह सौ रुपए से वेतन बढ़ा कर बीस से पच्चीस हजार तक कर दिया।इसलिए सरकार अभी शिक्षकों के लिए कुछ करने में मजबूर है।यह बात कहीं से तार्किक नहीं है क्योंकि महंगाई के दौर में यह रकम देश में निर्धारित न्यूनतम वेतन राशि से भी कम है।वहीं शायद सरकार यह बात बोलते हुए भूल जाती है की जिस समय शिक्षकों को पंद्रह सौ रुपए पर बहाल किया गया था वह अस्थाई व्यवस्था के तहत किया गया था।लेकिन सरकार ने बाद में भी नौजवान शिक्षकों के मजबूरी का फायदा उठाते हुए उनके श्रम और ज्ञान का अनैतिक रूप से दोहन तो कर रही है लेकिन उसके बदले उनके वैद्य मांगों को नजरअंदाज करने में कोई कोताही नहीं बरत रही।जिसका खामियाजा देश के नौनिहालों को भुगतना पड़ता है।उन्हें पढ़ाने की जगह शिक्षक कभी अपने वेतन के लिए कभी पेंशन के लिए कभी अन्य सुविधाओं के लिए आंदोलन करने को मजबूर हो जाते हैं।शिक्षकों को शायद ही कभी समय पर वेतन और अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाती है।सरकार द्वारा घोषित किए जाने वाले महंगाई भत्ता,वेतन वृद्धि का लाभ भी उन्हें बिना आंदोलन किए नहीं मिलता। सरकार क्यों शिक्षकों के ऊपर नियोजित होने का कलंक थोपी हुई है।यह देख कितना दुख होता है जिन शिक्षकों के ऊपर देश के नौनिहालों के भविष्य लिखने की जिम्मेवारी है खुद उनका भविष्य छोड़ो वर्तमान भी खराब है फिर उनके बाल बच्चों के भविष्य की चिंता की तो बात किस प्रकार किया जाए पता नहीं चलता।अगर नियोजित शिक्षक नियमित शिक्षकों की जितना वेतन और सुविधाएं पाने के हकदार नहीं है तो फिर नियमित शिक्षक की बहाली क्यों बंद कर दिया गया है।
क्या सरकारी यह बताएगी आने वाले दिनों में सरकार के पास गिनाने के लिए भी नियमित शिक्षक बचेंगे और क्या नियोजित शिक्षकों से नियमित शिक्षकों जैसा काम लिया जाता है या नहीं।इन्ही नियोजित शिक्षकों के बदौलत आज बिहार के मैट्रिक और इंटर परीक्षा का परिणाम सर्वोच्च ऊंचाई तक पहुंचा है।बिहार कदाचार युक्त परीक्षा के कलंक से मुक्त हुआ।जिस पर बिहार सरकार अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकती।शिक्षक कभी नहीं चाहते शिक्षण कार्य के जगह उन्हें सड़क से लेकर कोर्ट तक का चक्कर लगाना पड़े।उन्हें शौक नहीं है कि आराम से विद्यालयों में शिक्षण करने की जगह सड़क और सरकारी कार्यालयों के सामने प्रकृति और सरकारी अहंकार के हर मार को झेलते हुए धरना प्रदर्शन करें।आखिर क्यों सरकार शिक्षकों के साथ दोहरी नीति अपना रही है एक तरफ सरकार अन्य कर्मियों मंत्री विधायकों के वेतन में बढ़ोतरी कर रही है।वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों के समान काम समान वेतन के मामले में पटना उच्च न्यायालय द्वारा शिक्षकों के पक्ष में दिए गए निर्णय को लागू करने के जगह धन के रोना रोते हुए सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देती है जहां अपने सरकारी वकील पर भरोसा न करते हुए सरकारी धन लगाकर अन्य वकील सर्वोच्च न्यायालय में खड़ा कर न्यायालय के समक्ष वित्तीय मजबूरी के गुमराह करने वाले तथ्य और तर्क पेश कर अपने पक्ष में न्यायादेश हासिल करने में कामयाब हो जाती है।
इससे सरकार की मानसिकता का पता चल जाता है कि सरकार शिक्षकों के साथ किस तरह सौतेला व्यवहार कर रही है।जब विधायकों और विधान परिषद के सदस्यों के वेतन भत्ते एवं अन्य सुविधाओं में हर वर्ष भारी बढ़ोतरी किया जाता है तो उससे सरकार पर किसी भी प्रकार का वित्तीय बोझ नहीं पड़ता।अन्य विभागों के कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाएं भी लगातार इसी सरकार द्वारा बढाया गया,लेकिन जब बात नियोजित शिक्षकों के समान काम समान वेतन लागू करने की होती है तो सरकारी खजाना खाली पड़ जाता है।इससे साबित होता है सरकार किस तरह से शिक्षकों और कर्मचारियों के प्रति हीन भावना से ग्रस्त है।सरकार ने पिछले दिनों जिस तरह से विधायकों के वेतन भत्तों में 30 से 50% की बढ़ोतरी की इससे साबित होता है।जनता के सेवा के बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग जब सत्ता पा जाते हैं तो अपने मर्जी से जनता के मेहनत की गाढ़ी कमाई अपनी सुख सुविधा पर उड़ा डालते हैं।
लेकिन जब बात कर्मचारियों और शिक्षकों के वेतन भत्ते समेत अन्य सुविधाओं में बढ़ोतरी का होता है तो यही सरकार जो अपने सुख सुविधाओं पर पानी की तरह पैसे लुटाते रहती है।हाय तौबा मचाने लगती है।जनता को गुमराह करने के लिए विकास कार्य अवरुद्ध होने का स्वांग रचा शिक्षकों के खिलाफ जन भावना उभारने तक का प्रयास मीडिया के माध्यम से किया जाने लगता है.
अपने आप को जनसेवक बताने वाले लोग सत्ता मद में चूर होकर अपने ही कर्मचारियों के सुख सुविधा में कटौती करने को उतारू क्यों हैं?क्या वे बताएंगे अपने सुख सुविधाएं वेतन भत्ते किस से पूछकर बढ़ाते हैं।हद तो तब हो जाती है जब वे विधानमंडल सत्र तक का भी इंतजार नहीं करते और रातों-रात अपने सुख सुविधाओं में बढ़ोतरी कर लेते हैं।
जो कर्मचारी और शिक्षक अपने उम्र के अधिकतर समय जन सेवा में व्यतीत करता है।साठ वर्ष की उम्र तक देश को सेवा प्रदान करता है।उनके साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जा रहा है?खास करके दुख तो तब होता है जब नौनिहालों को कच्चे मिट्टी से सोने के घड़ा बनाने का कार्य करने वाले शिक्षकों के वेतन भत्ते मे कटौती कर लिया जाता है।वहीं जनता से वोट हासिल करने के लिए गैर जरूरी मदों में लाखों करोड़ों रुपए फूंक दिए जाते हैं।
शिक्षकों कर्मचारियों से पहले ही उनके बुढ़ापे की लाठी पेंशन की सुविधा छीन लिया गया है।लेकिन आज भी एक सप्ताह के लिए भी चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों को पेंशन की सुविधा प्रदान किया जा रहा है।अब तो नौबत ऐसी आ गई है लगता है कुछ दिनों में सरकारी शिक्षा प्रणाली ही खत्म कर दी जाएगा।क्योंकि जिस तरह से पहले पेंशन समाप्त किया गया।उसके बाद स्थाई नियुक्ति बंद कर दी गई।अब नियोजित शिक्षकों कर्मचारियों के साथ मजबूर गुलामों जैसे व्यवहार किया जा रहा है।उन्हें नित्य धमकी दिया जाता है हमारे आदेश को नहीं माना तो तुम्हें बिना कारण बताए तत्काल पद से मुक्त कर दिया जाएगा।मुकदमा दर्ज कर जेल में डाल दिया जाएगा।इतना ही नहीं अपने मांग को लेकर धरना दे रहे शिक्षकों पर लाठी डंडा चलवा दिया जाता है।इससे साबित होता है आने वाले दिनों में सरकारी शिक्षण प्रणाली को ध्वस्त कर,देशवासियों को पूंजीपतियों के द्वारा स्थापित शिक्षा की दुकानों में जाने को मजबूर कर दिया जाएगा।
वह दिन हिंदुस्तान के लिए दुर्भाग्यपूर्ण साबित होगा जिस दिन शिक्षा भी दुकान से खरीदा जाएगा।सरकार केवल जनता को गुमराह करने के लिए ही कर्मचारियों और खासकर के शिक्षकों के वेतन बढ़ाने के अवसर पर पैसा ना होने का रोना रोती है जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है अगर ऐसा होता तो आज विधायकों के वेतन में बढ़ोतरी नहीं किया जाता।जनता को भी समझना चाहिए आज भी सरकारी कर्मियों की हालत बहुत दयनीय है।उन्हें छः महीने तक वेतन के इंतजार करना पड़ता है। अपने ही वेतन और अन्य सुविधाएं प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के पापड़ बेलना पड़ता है।जनता अगर आज भी नहीं जागी तो आने वाले दिनों में उनके बाल बच्चों के साथ भी यही होने वाला है।शायद ही उनके बच्चों को सरकारी शिक्षा कर्मी और शिक्षक होने का मौका प्राप्त हो।
विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों के वेतन भक्ति और सुविधाओं में लगातार बढ़ोतरी से साबित हो गया है कि सरकार के पास नियोजित शिक्षकों के समान काम समान वेतन लागू करने के लिए धन की कोई कमी नहीं है।बल्कि उसके नियत में खोट है।इनका इरादा है आने वाले दिनों में सरकारी शिक्षण संस्थाओं को बर्बाद कर पूंजी पतियों की दुकान में बदलने का है।जहां इन्हें वार्षिक समारोह में आमंत्रित कर मोटी मोटी चुनावी चंदा दिया जाएगा,चादर और प्रतीक चिन्ह के साथ सोने की तलवार भेंट कर सम्मानित किया जाएगा।सरकार के इस असहिष्णु नीति से गरीब दलित पिछड़े मजलूम लोग एक बार फिर शिक्षा से दूर हो जाएंगे।सरकार के इन्हीं नीतियों के कारण शिक्षा और प्रगतिशील देश को बहुत नुकसान पहुंच रहा है।
शिक्षकों का समान काम समान वेतन और पुरानी पेंशन प्रणाली की मांग बिल्कुल जायज है।
जब तक इसे लागू नहीं किया जाएगा शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करना मुश्किल होगा।जब तक शिक्षकों को केंद्रीय विद्यालयों के शिक्षकों के समान वेतन और सुविधाएं प्रदान नहीं किया जाएगा उन विद्यालयों के समान शिक्षकों से कार्य करने का उम्मीद करना बेमानी है।वैसे भी ग्रंथों में लिखा गया है “भूखे भजन न होय गोपाला”।जिस तरह से देश में महंगाई अपने चरम सीमा पर है उसमें इतने कम वेतन में एक शिक्षक अपने परिवार का भरण पोषण नहीं कर सकता।उनको भी अपने बाल-बच्चों को पढ़ाने के लिए पास पैसे नहीं होते।सोचा जा सकता है आज इंजीनियरिंग कॉलेजों में मेडिकल संस्थानों में प्रबंधन कॉलेजों में एक वर्ष का शुल्क कितना है?उसके आधा छोड़ो एक चौथाई भी शिक्षकों का एक वर्ष का वेतन नहीं है।फिर वह कैसे पूर्ण समर्पण भाव से शिक्षण का कार्य कर सकते हैं।सरकार और जनता शिक्षकों से केंद्रीय विद्यालय सैनिक स्कूलों नेतरहाट और नवोदय विद्यालयों की तरह शिक्षा के उम्मीद करती है।लेकिन वहां के विद्यालयों और वहां के शिक्षकों को जिस प्रकार के सुविधाएं वेतन भत्ते प्रदान किया जाता है उसे देने की तरफ सोचती तक नहीं।शिक्षक ग्रामीण और सुदूरवर्ती इलाके में किस तरह से जा जा कर शिक्षा प्रदान कर रहे हैं यह सरकार के उच्च पदस्थ पदाधिकारी और नेता मंत्री गण एक बार ग्रामीण स्कूलों में जाकर देखें तब महसूस होगा शिक्षक कितना मेहनत करते हैं।सरकार अगर सभी शिक्षकों को एक बार में समान काम समान वेतन देने में सक्षम नहीं है तो चरण वार उन्हें एक प्रणाली विकसित कर सुविधा प्रदान क।ताकि बिहार जैसे गरीब राज्य के बच्चे जिन शिक्षकों और शिक्षा के बदौलत ही केंद्रीय सेवाओं में अपना परचम लहराते रहते हैं आगे भी लहराएं।

गोपेंद्र कुमार गौतम
सामाजिक और राजनीतिक चिंतक
औरंगाबाद बिहार
व्हाट्सएप नंबर 95 07 34 1433

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