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नफरतों से हमारी रगो में उबाल क्यों नहीं

नफरतों से हमारी रगो में उबाल क्यों नहीं,
बढ़ती हरकतों पर हमारे बीच सवाल क्यों नहीं।।

इन कौमी हमले पर जरा सोचिये जनाब,
शर्मनाक हिंसा पर दुनिया में बवाल क्यों नहीं।।

नफरतों के बीज से आतंक ही होगा पैदा,
अपने आप से पूछते सवाल क्यों नहीं।

जिस माटी का खाया नमक, हक़ अदा करो,
नमक हराम क्यों नमक हलाल क्यों नहीं।।

हिंसक हमलों में लहुं में उबाल क्यों नहीं
दिलों में नफरत पर दुनिया मे सवाल क्यों नहीं।।

मुह में राम बगल में छुरी ऐसे में हैरान क्यों नहीं।
हवाओ में नफरत घोलनें पर भूचाल क्यों नहीं।

ये इंसानियत का खुले आम क़त्ल है
अगली पीढ़ी क्या सीखेगी तुम्हे मलाल क्यों नहीं।।

संजीव ठाकुर

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