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विरोध जताने के लिए घृणा फैलाने का ताण्डव क्यों?

बुझ चुकी है उनके दिलों की रोशनी इसलिए वो मातम मनाने बैठे हैं, वरना दुनिया में रोशनी तो लगातार जगमगा रही है।
संविधान, सरकार की कार्यप्रणाली और मानवीय मूल्यों के संरक्षण और अधिकारों के हनन की बात करने वाले ही जब अभिव्यक्ति के नाम पर संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों के प्रति अमर्यादित आचरण, असभ्य और असंयमित भाषा, राजनैतिक लाभ के लिए तर्कहीन बयानबाजी का प्रयोग करते हुए समाज को भ्रमित करने, जहर उगल कर नफरत फैलाने लगें तो ऐसे लोगों की मंशा, नीयत, चाल और चरित्र पर सन्देह करना जायज है। दोहरा चरित्र और दोहरे मापदण्ड अपनाने वालों की पोल खुल ही जाती है क्योंकि किसी भी व्यक्ति की सोच और भाषा उसके व्यक्तित्व का आइना होती है। अगर स्वयं के आइने पर धूल जमीं हो तो वह न परिवार का, न समाज का और न ही राष्ट्र का भला सोच सकता है, कर सकता है। वह तो हर परिस्थिति में सिर्फ और सिर्फ क्रन्दन कर सकता है। हर समय समाज में भय, अनिश्चितता और निराशा का वातावरण बनाने में ही लगा रहता है। तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने की कला में निपूर्ण होते हैं, इसमें कोई मुकाबला नहीं इनका।
बेलगाम होती अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सोशल मीडिया पर मरघट के दृश्य, जलती चिताएँ, लाशों के ढेर जैसे अनेक विचलित कर देने वाले चित्रों को अलग-अलग तरह से प्रसारित करके देश में सरकार के प्रति घृणा परोसी जा रही है। जी भर के कोसा जा रहा है, अविश्वास पैदा किया जा रहा है वर्तमान नेतृत्व के खिलाफ। यह कैसा रवैया है विरोध जताने का? महामारी के काल में जहाँ संयम, जागरूकता, सार्थक पहल, सकारात्मक सोच के साथ-साथ एक दूसरे का हौसला बढ़ाने का समय है लेकिन अपने गिरेबां में न झाँकते हुए दूसरों को कोसने का सिलसिला लगातार जारी है। अपने-अपने कार्यकाल में केन्द्र और राज्यों में सत्ता पर काबिज सरकारों ने समय और परिस्थिति के अनुसार कार्य किये हैं उनमें अच्छे भी हो सकते हैं तो कुछ कमियां भी रह सकती हैं। लेकिन विरोध, घोर नकारात्मक तरीके से, घृणित विरोध का ताण्डव कभी भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।
देश और जनता के प्रति सरकार की जिम्मेदारी है तो जनता की भी देश के प्रति जिम्मेदारी है। आपकी दृष्टि से सरकार की नीति सही नहीं है तो आप घृणित प्रचार कर रहे हैं लेकिन आप अपनी जिम्मेदारी को, देश का नागरिक होने के कर्त्तव्य को, अपने मौलिक अधिकारों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर रहे हैं तो क्या आपके प्रति भी दूसरे नागरिक घृणा का रवैया घारण करते हुए आपके खिलाफ जहर उगलें? सरकार को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाने में, जनता के प्रति जवाबदारी तय करने का नकारात्मक रवैया अपना कर स्वयं को देश का न्यायधीश तो समझ बैठे हो लेकिन अपने अधिकार, कर्त्तव्य और दायित्वों का स्वयं ही चीर हरण करने में लगे हो, वाह! क्या दोहरा चरित्र है? सरकार से ही सब कुछ चाहते हो, स्वयं कुछ नहीं करना चाहते। देश जितना सरकार और शासन-प्रशासन चलाने वालों का है उतना आपका भी है लेकिन अभिव्यक्ति के नाम पर लोगों के मन, मस्तिष्क में जहर मत घोलो, दिलों में नफरत मत भरो, महामारी काल में दिन-रात, लगातार, बिना थके, बिना रूके निष्ठा के साथ अपना कर्म करने वाले कोरोना वारियर्स के त्याग और बलिदान का भद्दा मजाक मत बनाओ।
कोई भी सरकार महामारी या आपदा से जनता के सहयोग के बिना मुकाबला नहीं कर सकती। आवश्यक है उपलब्ध संसाधनो, सुविधाओं में तालमेल बैठाने का, सरकार द्वारा समय-समय पर जाने किये गये आदेशों की पालना करने का। देश महामारी से तभी उभरेगा जब आप ऊपर चढ़ते हुए को नीचे से टाँग खींच कर गिराने की बजाय उसका हाथ पकड़ कर ऊपर खींच लोगे। व्यवस्था में कमियाँ उजागर करने के लिए नफरत भरी आलोचना करने से समाज में अराजकता बढ़ती है, ऐसा नहीं होना चाहिए। सत्य-असत्य, देव-दानव, मानव-राक्षस, सुर-असुर में संग्राम युगों-युगों से निरन्तर चल रहा है और आज भी जारी है। हर काल में माध्यम बदल जाते हैं, तरीके बदल जाते हैं। आज यह सोशल मीडिया के माध्यम से भी लड़ा जा रहा है। जहाँ सच कम और झूठ ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर। असहमति पर शब्दों और चित्रों के माध्यम से इतना असंवेदनशील ताण्डव किसी भी दृष्टिकोण से न तो न्याय सम्मत और न तर्क सम्मत माना जा सकता है। क्या परिजनों से असहमति होने पर भी ऐसा ही आचरण करते हैं…? सरकार की कार्यशैली से इतनी नफरत ठीक नहीं। संकटकाल में कुछ लोगों द्वारा बहुत ज्यादा नकारात्मक रवैया अपनाया हुआ है उन्हें मानवीय संवेदनाओं का भी ध्यान रखना चाहिये। आलोचना अवश्य करो लेकिन ऐसी नहीं जिससे समाज और राष्ट्र को नुकसान हो, प्रगति में बाधा बने, विदेशों में गलत सन्देश प्रसारित हो। आपस में द्वैष, कटुता, वैमनस्य, भय, सनसनी पैदा करने वाली पोस्ट लिखने और प्रचारित करने से बचें।
जय हिन्द! वन्देमातरम्।

विवेक मित्तल
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