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वो सुबह कभी तो आयेगी…!

मानव जीवन के दो पहलू हैं। एक है सुख और दूसरा है दुख। जीवन में सुख भी आते हैं और दुख भी आते है और जीवन सुख दुख के साथ यूं ही चलता रहता है।वो कहते हैं न कि धूप आती हैं तो धूप के बाद छांव भी आती है। ईश्वर ने जीवन के दो पलड़े निर्धारित किए हैं, इन पलड़ों में कभी कोई पलड़ा भारी होता है तो कभी कोई पलड़ा भारी होता है। वर्तमान में कोरोना को लेकर पूरा विश्व भयभीत और खौफ में है। अजी खुशी ग़र जिंदगी का हिस्सा है तो मायूसी भी तो जिंदगी का ही हिस्सा है। सुख के बिना दुख का और दुख के बिना सुख का कोई महत्व नहीं है। मान लीजिए आदमी अगर हमेशा सुखी ही सुखी रहेगा तो उसे कभी भी दुख का अहसास नहीं होगा, और दुखी रहेगा तो उसे सुख का अहसास ही नहीं हो पायेगा, इसलिए जीवन में दोनों का होना जरूरी है। अजी, हम तो कहते हैं कि जीवन में कभी भी दुख का आविर्भाव हो तो सुख की चाह नहीं करो, और जब सुख का आविर्भाव हो तो कभी भी दुख की चाह मत करो। जीवन को जैसा है वैसा चलने दो, क्योंकि यह प्रकृति का चक्र है और हम चक्र में कोई बदलाव नहीं कर सकते हैंं। आप जानते हैं कि दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन निकलता है, यह प्रकृति चक्र है। जीवन है तो मृत्यु भी तो है। यहाँ हम आपको दर्शन नहीं पढ़ा रहे, बल्कि जीवन की कटु सच्चाई से अवगत करवा रहे हैं। आप दर्शन पढ़ेंगे तो यही पायेंगे, आप कोई भी साहित्य पढ़ लिजिए, आपको यही सत्य पढ़ने को मिलेगा। ईश्वर ने हमारे हाथों की पांचों अंगुलियों को भी समान नहीं बनाया है, उनमें फर्क किया है, ठीक उसी प्रकार से जीवन भी हमेशा समानता से नहीं चलता, उसमें कभी सुख का सागर मिलता है तो कभी दुख का ढ़ेर। लेकिन इतना तय है कि एक ही का आविर्भाव हमेशा नहीं रहता, जिस प्रकार से धूप के बाद छांव आती है, ठीक उसी प्रकार से छांव के बाद धूप का आना तय है। कोरोना को आप यहां धूप मान सकते हैं, अभी पूरे विश्व में कोरोना को लेकर हाहाकार मचा हुआ है, लेकिन इससे डरें नहीं, घबराएं नहीं, धैर्य के साथ, शांति के साथ, संयम के साथ इस दुख की घड़ी को तटस्थ भाव से बस आप देखते रहें, यह भी चला जायेगा, निश्चित ही इसका जाना तय है, क्योंकि प्रकृति अपने चक्र को अनवरत चलाती हैं, वह स्वयं इसे बदल देगी। समय कभी भी इकसार(एक जैसा)नहीं रहता, कभी नहीं रह सकता जी।अब आप देखिए न, कोरोना ने भले ही इस पूरे विश्व में आतंक ,डर और खौफ फैला दिया, बहुत से लोगों की जानें चली गईं, जो बहुत ही दुखद है, अफसोसनाक है, लेकिन अगर देखा जाए तो इसका एक सकारात्मक ,उजला पक्ष भी कहीं न कहीं है। वैसे कोरोना प्रकृति का कोप है, क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति के साथ बहुत विश्वासघात किया है, उसे कहीं का नहीं छोड़ा, आदमी अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए सदैव प्रकृति को निचोड़ता रहा, लेकिन कोरोना द्वारा इस धरती को रौंद डालने के बावजूद एक पक्ष यह भी है कि इसने परिवारों को घर में कैद कर दिया, जो परिवार के सदस्य कामकाज के बोझ के कारण अथवा अन्य किसी परिस्थितियों वश कभी आपस में मिल बैठ नहीं पाते थे, आज लॉकडाउन के कारण घरों में एक साथ खाना खा रहे हैं, आपस में बतिया रहे हैं, सांप सीढ़ी लुडो जैसे गेम खेल रहे हैं। उनका खाली समय आनंद, प्यार में बीत रहा है। कोई मोबाइल पर प्रवचन सुन रहे हैं तो कोई पारिवारिक व कॉमेडी फिल्में देख रहे हैं तो कोई नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा अर्चना में व्यस्त हैं। अब तो सुनने में आ रहा है कि दूरदर्शन जनता की मांग पर प्रातः 900 और रात को 2100 बजे रामायण जैसे आध्यात्मिक धारावाहिक की पुनः शुरूआत करने जा रहा है। कैसा अवसर आया है ? हमें धन्यवाद कहना चाहिए कोरोना का जिसने परिवारों को आपस में रहना और मिलना सिखा दिया, हालांकि कोरोना ने आतंक मचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है, लेकिन यह भी जीवन का ही कहीं न कहीं पक्ष ही कहा जा सकता है। जब मैं यह आर्टिकल लिख रहा हूँ याद आता है कि लगभग तीन दशक पहले हमारे घर में टीवी नहीं होता था और उस समय ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का जमाना था, हम हमारे पड़ौसी किसी स्वर्णकार(सोने का काम करने वाले) के घर जाकर टीवी पर रामायण देखते थे।देश में आज जिस प्रकार के कर्फ्यू के हालत हमें देखने को मिल रहे हैं, ठीक वैसे हालात उस समय हमें देखने को मिलते थे,क्योंकि रामायण भारत के आध्यात्मिक लोगों की पहली और बड़ी पसंद थी। लाइट चली जाने पर उस समय सभी चिल्लाते थे,बिजली विभाग के प्रति अपनी धौंस, गुस्सा निकालते थे, क्योंकि वह जमाना ही ऐसा था, आज घर घर में टीवी है, हमें दुबारा रामायण देखने को मिलने जा रही है, यह हमारा परम सौभाग्य है। आपको नहीं लगता इतनी शांति और समय के साथ ही आपस में रहने,मिलने जुलने (अपने घर में घर के सदस्यों के साथ),हंसी मजाक करने का समय हमें इस खौफनाक, खतरनाक कोरोना ने ही आखिरकार दिया है।आदमी को जीवन में सुख और दुख दोनों को सहृदयता से स्वीकार करना चाहिए, यह समय भी आखिर निकल ही जायेगा। एक तरफ तो कोरोना से दहशत, डर व खौफ का माहौल है लेकिन लोग जाति, धर्म, मजहब, लिंग,वैमनस्यता की भावना भूलकर निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं। कहीं न कहीं इंसानियत का भाव लोगों में देखने को मिल रहा है।पूरी मानवजाति कोरोना से एकजुट हो कर लड़ रही है। सरकार व प्रशासन मुस्तैदी से अपना काम कर रहे हैं। डाक्टर्स, नर्सेज, समस्त मेडिकल स्टाफ एकजुट हो कर इंसानियत के लिए निरंतर कार्य करने में लगा है, यह काबिलेतारीफ है, हम आप सभी के जज्बे को निरंतर बारम्बार नमन पर नमन करते हैं। हम तो यही कहेंगे-
” इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमें गायेगी…..
वो सुबह कभी तो आयेगी, वो सुबह कभी तो आयेगी।
झेलम की लहरें कहतीं है, उम्मीद अभी तो बाकी है।
ये रात कभी तो गुजरेगी, वो सुबह कभी तो आयेगी,
वो सुबह कभी तो आयेगी।”

धार्विक नमन, “शौर्य”, पटियाला, पंजाब।
(स्वतंत्र लेखक व साहित्यकार)
मोबाइल 7002291248

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