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क्या नई शिक्षा नीति से शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन आएंगे?

भारत में ज्ञान प्रदान करने की एक अति समृद्ध परंपरा रही है। ‘गुरुकुल’ प्राचीन भारत में एक प्रकार की शिक्षा प्रणाली थी जिसमें एक ही घर में गुरु के साथ रहने वाले शिष्य (छात्र) थे। नालंदा इस  दुनिया में शिक्षा का सबसे पुराना विश्वविद्यालय-तंत्र था। दुनिया भर के छात्र भारतीय ज्ञान प्रणालियों से आकर्षित और अचंभित थे। आधुनिक ज्ञान प्रणाली की कई शाखाओं की उत्पत्ति भारत में हुई थी। प्राचीन भारत में शिक्षा को एक उच्च गुण माने जाने के पीछे हमारी प्राचीन ज्ञान परमपरा ही रही है।  हालांकि, आधुनिक भारत औपनिवेशिक शासन के वर्षों, वित्तीय बाधाओं और गलत नीतियों के कारण भारतीय शिक्षा पद्धति अपने शुरुआती बढ़त को भुनाने में विफल रही है, जिसका खमियाजा पूरे हिन्दुस्तान को पीढ़ियों तक भुगतना पड़ा है। आज मोदी सरकार भारत में शिक्षा प्रणाली के पुनर्गठन के लिए नई शिक्षा नीति को नवाचारों के साथ लेकर आई है जो अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करके भविष्य में चौथी औद्योगिक क्रांति में भारतीय जरूरतों को पूरा करेगी। नई शिक्षा नीति का मसौदा राष्ट्रीय शिक्षा नीति  समिति डॉ के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में  31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर अंतिम रूप से पेश हुआ था और बजट 2019-20 में जल्द ही इस नीति को लागू करने का प्रस्ताव किया गया था। आज इस शिक्षा नीति को अगले वर्ष से पूरे देश भर में लागू कर दिया गया है।
वर्तमान शिक्षा नीति में खामियों के चलते इस नए रूप को लाने की आवश्यकता अनुभव की गई थी। वैसे भी वर्तमान पाठ्यक्रम बच्चों की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। और वर्तमान शिक्षा क्षेत्र योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी से बुरी तरह संघर्ष कर रहा है। वर्तमान में, बचपन की अधिकांश शिक्षा आंगनवाड़ियों और निजी-प्ले स्कूलों के माध्यम से दी जाती है। हालांकि, इस नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक बचपन के शैक्षिक पहलुओं पर कम ध्यान दिया गया है। नीति में बचपन की देखभाल और शिक्षा के लिए दो-भाग के पाठ्यक्रम को विकसित करने की सिफारिश की गई है। तीन साल तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश और  तीन से आठ साल के बच्चों के लिए शैक्षिक ढांचा। जो आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार और विस्तार और प्राथमिक विद्यालयों के साथ आंगनवाड़ियों के सह-कार्यान्वयन द्वारा लागू किया जाएगा। नई नीति में तीन से 18 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के दायरे में विस्तार की बात हुई है, जिसमे  प्रारंभिक बचपन की शिक्षा और माध्यमिक स्कूल शिक्षा शामिल है। सतत और व्यापक मूल्यांकन और नो-डिटेंशन पॉलिसी पर आरटीई अधिनियम में हालिया संशोधनों की समीक्षा पर जोर  दिया गया है। कक्षा आठ तक के बच्चों के लिए स्कूलों को यह सुनिश्चित करने के दिशा निर्देश दिए गए है कि बच्चे आयु-उपयुक्त सीखने के स्तर को प्राप्त कर रहे हैं या नहीं। अब नई नीति के आधार पर केवल मूल अवधारणा का परीक्षण करने के लिए बोर्ड परीक्षाओं का पुनर्गठन किया जायेगा न की टोपर ढूंढने के लिए। ये बोर्ड परीक्षा कई विषयों पर होगी। छात्र अपने विषयों और सेमेस्टर का चयन अपनी रूचि अनुसार कर सकते हैं, जिसमे वो विज्ञान के साथ कला के विषयों को पढ़ने का अवसर भी अपनी रूचि अनुसार पा सकेंगे।
छात्रों की विकास आवश्यकताओं के आधार पर स्कूली शिक्षा की वर्तमान संरचना का पुनर्गठन किया गया है। जिसमे 10 + 2 + 3 संरचना को 5-3-3-4 डिज़ाइन द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना है जिसमें शामिल हैं: (i) पांच साल का फाउंडेशनल स्टेज (पूर्व-प्राथमिक स्कूल के तीन साल और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन साल मंच (कक्षा तीन से पांच), (iii) तीन साल का मध्य चरण (कक्षा छह से आठ), और (iv) चार साल का माध्यमिक चरण (कक्षा नौ से 12)। वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल रट्टा सीखने पर केंद्रित है। अब पाठ्यक्रम भार को इसकी आवश्यक मूल सामग्री तक कम किये जाने के प्रयास किये गए हैं। स्कूल परीक्षा सुधार हेतु नए तरीके ढूंढें गए है, वर्तमान बोर्ड परीक्षाएं छात्रों को केवल कुछ विषयों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर करती है, जो उनके सर्वागीण विकास में बाधक है, ख़ुशी-ख़ुशी पढाई करना तो भारतीय छात्रों को आता ही नहीं। आज की पद्धत्ति में एक फार्मूलाबद्ध तरीके से सीखने का परीक्षण  छात्रों में तनाव का कारण बन गया है ।
यद्यपि हर बस्ती में प्राथमिक स्कूलों की स्थापना ने शिक्षा की पहुंच को बढ़ाया है, इसने बहुत छोटे स्कूलों के विकास को संचालित किया है लेकिन वो इसे जटिल बनाते हैं। इसलिए नई नीति में स्कूल परिसर बनाने के लिए कई पब्लिक स्कूलों को एक साथ लाया जाना चाहिए की बात की गई है। इसके लिए एक कॉम्प्लेक्स में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और उसके पड़ोस के सभी पब्लिक स्कूल शामिल होंगे जो कि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक शिक्षा प्रदान करते हैं। इनमें आंगनवाड़ियों, व्यावसायिक शिक्षा सुविधाओं और एक वयस्क शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध-स्वायत्त इकाई होगी जो प्रारंभिक अवस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा तक सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगे। बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित शिक्षकों जैसे संसाधनों को एक स्कूल परिसर में कुशलता से साझा करने के हर प्रयास किये जायेंगे।
पेशेवर योग्य शिक्षकों की कमी और गैर-शैक्षिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती में वृद्धि ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को त्रस्त कर दिया है। इसके लिए नई नीति के अनुसार शिक्षकों की नयी भर्ती और उनको को कम से कम पांच से सात साल के लिए एक विशेष स्कूल परिसर में तैनात किया जाना चाहिए पर जोर दिया गया है। उन्हें स्कूल के घंटों के दौरान किसी भी गैर-शिक्षण गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मौजूदा बी.एड. कार्यक्रम को चार वर्षीय एकीकृत बी.एड द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा। उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री, शिक्षाशास्त्र और व्यावहारिक प्रशिक्षण और सभी विषयों के लिए एक एकीकृत सतत व्यावसायिक विकास भी किया जाएगा। नीति निर्धारण, स्कूल संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से स्कूलों के विनियमन को अलग अलग संचालित किया जायेगा। प्रत्येक राज्य के लिए स्वतंत्र राज्य स्कूल नियामक प्राधिकरण स्थापित किये जायेंगे जो सार्वजनिक और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी समान मानकों को निर्धारित करेंगे। नीति को मजबूत करने के लिए राज्य का शिक्षा विभाग नीति तैयार करेगा और निगरानी और पर्यवेक्षण करेगा। सही में नई शिक्षा नीति में शोध,और अनुसंधान पर बल दिया गया है, तकनीकी के उपयोग, विभिन्न विषयों के बीच परस्पर सहयोग, सामंजस्य और संवाद, शिक्षकों का प्रशिक्षण , ये सभी सम्मिलित रूप से देश के शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाएंगे। शिक्षा क्षेत्र में नवीनतम कस्तूरीरंगन रिपोर्ट या नई शिक्षा नीति का मसौदा शिक्षा में सुधार के लिए समय की आवश्यकता को दर्शाता है। आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली एक सुधार के लिए रो रही है। नई शिक्षा नीति (एनईपी) का मसौदा अपने पिछले इतिहास, उपलब्धियों, गलतफहमी का जायजा लेने और 21 वीं सदी के भारत के लिए भविष्य की शिक्षा योजना का चार्ट बनाने का सही समय है।
प्रियंका सौरभ
(रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)
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