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मिश्रा जी के साथ ने दिया मुझे आसमान

विवाह की वर्षगाठ पर विशेष

बाल्यकाल मे कविता कहानी के मंचो से होते हुए जब बीए फाइनल में पहुंची तो अल्हड सी भावना की शादी 9 मई 1997 को बगड़ के कमलेश मिश्रा जी के साथ हो गई । शादी और बीए की परीक्षा लगभग साथ-साथ थी क्योंकि उस समय शादी को ही ज्यादा वरीयता मिलती थी।
ये वक्त वो वक्त था जब लड़कियों की शादी समय पर हो जाती थी तो लडकी को बड़ा भाग्यशाली माना जाता था।
स्वर्गीय श्री मणिशंकर शर्मा जी की लाडली शादी होने के बाद घरेलू जिंदगी की रस्साकशी की परीक्षा में पूरजौर लग गई पर पति की नौकरी बाड़मेर और मै बगड़। विरहिणी भावना के लिए रास्ता पढाई का निकाला गया कि जब तक झुंझुनूं ट्रांसफर नही होता ससुराल में प्राइवेट एम ए कर लो, मन लगा रहेगा। फिर मिश्रा जी झुंझुनूं आते हैं पर अचानक से सासू मांं के बीमार होने के बाद अध्ययन श्रंखला के पंख कुतर गए पर आपकी भावना एम ए हो गई 2001 मे। फिर वही चुल्हे चौके और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारी मे जीवन के रंग आत्मसात करने लगी तब सासू मां गुजर गई और फिर धीरे धीरे वही अकेलेपन की जिंदगी। सासू माँ मेरी बहुत प्यारी सहेली भी थी। 2005 मे बेटे भव्य के लिए बगड़ से झुंझुनूं आ गए पर भव्य की स्कूल आते जाते पढने की इच्छाओं ने फिर हिलोरें मारी तब मिश्रा जी ने कमान संभाली और पीटीईटी का फार्म 2006 मे भरवाया और भावना शर्मा एम ए बीएड (2007) हो गई और उस मोतीलाल कालेज में हुई कुछ कहासुनी ने दिल को चोट पहुंचाई और एम एड की प्रवेश परीक्षा में शामिल हुई और वसुंधरा टी टी कालेज से एम एड भी हो गई। 2008 मे सेठ शिव भगवान पटवारी महाविद्यालय में पढाने के दरमियाँ किसी शिक्षक ने नेट के बारे में बताया तो परीक्षा दी और 2008 मे नेट भी हो गई। आपके प्रोत्साहन से भावना की महत्वकांक्षा बढती ही जा रही थी अब ललक पीएचडी की थी कई गुरू टटोले पर सबने मना कर दिया कि बहुत श्रमसाध्य है, आपसे नही हो पाएगा, मानो मेरे चेहरे पर लिखा था कि बेटा बस की बात नहीं। पीएचडी खरीदनी नही थी करनी थी तो बस इधर उधर हाथ पांव मारने की जद्दोजहद रही।
उस वक्त पहली बार राजस्थान विश्वविद्यालय मे पीएचडी के एंट्रेस एक्जाम शुरू हुए थे, भाग लिया, नबंर आया और राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के राजनीति विज्ञान विभाग की विद्यार्थी बनी और छ माह के कोर्सवर्क के बाद गाइड ढूंढने का युद्ध स्तर पर अभियान और फिर मिले डॉ शिप्रा वर्मा जी जिनके सानिध्य में मैने पीएचडी की। सडक दुर्घटना भी इसी दौर का हिस्सा थी और काफी प्रतिकूल हालात में साथ देने वाले स्वर्गीय रमेश दाधीच और डॉ राजेश शर्मा, डॉ संजय भारद्वाज, डाॅ सोहनलाल मीणा जी भी थे जो हमेशा मुझे प्रेरित करते रहे। टूटे फूटे केस होने के बाद भी 9 अक्टूबर 2014 को पीएचडी का वायव्या तत्पश्चात 9 दिसंबर 2014 को पोस्ट डाक्टरल अवार्ड हुआ और मेरे मार्गदर्शक बने प्रोफेसर निधिलेखा शर्मा जी और उनके सानिध्य में 2016 को पोस्ट डाक्टरल भी पूरी हुई। आईसीएसएसआरआर से शोध पुस्तक के प्रकाशन के लिए फैलोशिप मिली 2017 मे, और अध्यापन अनुभव के साथ ही कितने आर्टिकल पब्लिश होने का सौभाग्य, सेमीनार मे भाग लेने का अनुभव और मेरे कुछ होने का सुकून। ये सब उपलब्धियां मेरी अकेली की नही थी । मै केवल बीए पास आई थी और आप मेरी उडान के पंख बने तब भावना परवाज़ चढ पाई । आप अदृश्य दीवार बन कर हमेशा साथ रहे और मै कभी भी नहीं हारी। आप मेरे हर मंच संचालन के रिद्म बने, मेरी हर कविता के पहले श्रोता भी आप बने।
आज सब कहते हैं कि भावना बहुत प्रतिभाशाली है पर सबको नहीं पता कि मुझे तराशने का श्रेय तो सिर्फ कमलेश मिश्रा का ही है।
चौबीस साल से आपने मुझे गढा है, आपने मुझे पढा है, मेरे हर सपनो को जिया है और मेरे हर गम को पिया है, मै महज एक कंगुरा हूँ पर मेरी नीवं की ईट आप है और मै आज जो भी हूँ आपकी हिम्मत से हूँ।

 

डॉ भावना शर्मा

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