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स्त्री और अस्तित्व

मुँह अँधेरे उठती है वह
बुहारती है आँगन माजती है वर्तन
बाबू को देती है दवाई और
माँ की गाँछती है चोटी
बच्चों का तैयार करती है स्कूल बैग
और बांधती है टिफीन
सुबह पति को बेड-टी से उठाती है
दरवाजे तक आ छोड़ती है आफिस
फिर,रसोई के बचे भोजन से मिटाती है भूख
परिवार में सबकी पीड़ा का मरहम है वह
खुद के दर्द से बेपरवाह है वह
समर्पण ही उसकी ख़ुशी है
अर्पण ही उसका मोक्ष
परिवार ही उसका तीर्थ
वह एक स्त्री है
स्त्री ही नहीं, हमारा अस्तिव है
मेरे जीवन और संस्कार का मूलत्व
वह है तो मैं पूर्ण हूँ, वरना अपूर्ण हूँ

प्रभुनाथ शुक्ल

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