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महिला समानता और सामाजिक योगदान

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाता है। भले ही सन 1910 से यह दिवस मनाया जा रहा है, अगर आंकड़ों पर गौर करें तो दिल दहल जायेगा। हकीकत यह है कि महिलाएं आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। महिलाएं पुरुष की तुलना में बेहद संकुचित क्षेत्र में चारदीवारी के भीतर ही रहती आई हैं। अँधेरा होते ही महिला अधिकार और स्वतंत्रता छू मंतर हो जाते है।
भारतीय संस्कृति में नारी अस्मिता और सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक श्लोक है- यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। मगर आज सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। न नारी की पूजा हो रही है और देवताओं की जगह सर्वत्र राक्षस ही राक्षस दिखाई दे रहे है। महिला सशक्तिकरण और बराबरी के तमाम दावों के बावजूद आजादी के लगभग सात दशकों बाद भी समाज में महिलाओं की हालत में कोई खास सुधार नहीं आया है । समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में बढ़ती शिक्षा के बावजूद देश में आर्थिक मोर्चे पर उनकी भागीदारी में गिरावट आई है। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर परिवारों में अब भी महिलाओं को घर से दूर रह कर नौकरी करने की इजाजत नहीं है। घर-परिवार व पति से दूर रह कर नौकरी करने वाली महिलाओं को समाज में अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता।


आधी आबादी को चाहिए स्वतंत्रता और समानता से जीने का अधिकार। घर-समाज-देश दुनिया की अधिकांश आर्थिक शक्तियां पुरुषों के पास हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार विश्व की समूची संपत्ति में केवल 2 प्रतिशत मालिक महिलाएं हैं। चल-अचल संपत्ति में भी भारी असमानता है। महिला को हमने चैकी चूल्हे तक सीमित कर रखा है। साथ घूमने ,सिनेमा देखने या शॉपिंग पर ले जाने मात्र से महिला को उसके अधिकार नहीं मिल जायेंगे। इसके लिए हमें अपनी संकीर्ण सोच के दायरे से बाहर निकलना होगा। मानसिकता बदलनी होगी। नजरियाँ साफ करना होगा। अपनी और दूसरे की बेटी को एक समझना होगा।
आजादी के 73 वर्ष बीत जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति गौर करने के लायक है। आये दिन समाचार पत्रों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी खबरों को पढ़ा जा सकता है, स्वतंत्रता के 7 दशक बाद भी ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं को दोयम दर्जे की मार से जूझना पड़ रहा है। यूनीसेफ की रिपोर्ट यह बाताती है कि महिलाएं नागरिक प्रशासन में भागीदारी निभाने में सक्षम हैं। यही नहीं, महिलाओं के प्रतिनिधित्व के बगैर किसी भी क्षेत्र में काम ठीक से और पूर्णता के साथ संपादित नहीं हो सकता।
आजादी से पूर्व हमारा देश अनेक रूढ़ियों से ग्रसित था। बेटी को कोख में मारने, सती प्रथा जैसी कुप्रथा समाज में प्रचलित थी। नारी को पढ़ाना तक पाप समझा जाता था। नारी घूंघट में रहे, ऐसा हमारा सोचना और विचारना था। अंग्रेजों के आने के बाद हालांकि नारी स्वतंत्रता और समानता की बातें सुनने और पढ़ने को मिली। धीरे-धीरे समाज और वातावरण में आये बदलाव ने महिला स्वतंत्रता को समझा और उनके अधिकारों और कत्र्तव्यों की बातें होने लगी। नारी को चूल्हे-चैकी से बाहर लाया गया। इस दौरान शिक्षा के विस्तार ने क्रांतिकारी बदलाव का मार्ग अख्तियार किया और शिक्षा रूपी ज्ञान की रोशनी से हमारा समाज जगमगाया। हमने महिला शिक्षा की अहमियत समझी और उन तक शिक्षा की ज्योति को पहुंचाया।
एक स्वयंसेवी संस्था की रिपोर्ट में जाहिर किया गया है कि महिला की दुश्मन महिला ही है। वह भूल जाती है कि वह भी महिला है। इसलिए सबसे पहले महिला ही अपनी सोच को बदले और अपनी संतान को आगे बढ़ाने का साहसी कदम उठाये। महिला विकास और महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे बड़ी बाधा भ्रूण हत्या है। भ्रूण हत्या हमारे पुरजोर प्रयासों के बावजूद पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाई है जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है। लड़कियों को शिक्षा ओर रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में हमारे सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बाधाएँ सामने आती हैं। हम लड़कों को आगे बढ़ाने में अपनी रूचि लेते हैं ओर लड़कियों को पीछे रखने में अपनी भलाई समझते हैं। हमें अपनी इसी सोच को बदलना होगा। कहते है कि एक लड़की शिक्षित हुई तो पूरा परिवार शिक्षा की रोशनी से जगमगाने लगेगा।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
D-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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