National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

मजबूत नहीं मजबूर हैं मजदूर

1 मई – मजदूर दिवस के अवसर पर

खो बैठा एक दिन की मजदूरी,
आज एक मजदूर मजबूरी में रोया था।
जाने किसके लिए मई दिवस ये आता है,
परिवार आज उसका फिर भूखा ही सोया था।।

अधोलिखित पंक्तियों का अर्थ लॉकडाउन तक सीमित नहीं है। यह हमेशा से चले आ रहे मजबूर मजदूर की दीन गाथा है। वे जितना मजबूत बनना चाहते हैं उतना ही मजबूर बनते जाते हैं। उनके लिए दो जून की रोटी, बदन पर एक लत्ता और सिर पर एक छत की अभिलाषा गीता और कुरान से अधिक महत्व रखती है। दुनिया चाहे ईश्वर ने बनाई हो, पर इसे बदलने और गढ़ने वाला तो मजदूर ही है। आज उनका दिन है, यानी मई दिवस है। जब-जब श्रम का शोषण किया जाता है तब-तब विद्रोह बाहुबलि की भाँति अपना दमखम दिखाता रहता है। इस सच्चाई को ठुकराने का ही परिणाम था कि एक मई 1886 को अमेरिका में मजदूरों के आंदोलन ने उपद्रवी रूप ले लिया। इस आंदोलन के दौरान अमेरिका में मजदूर काम करने के लिए 8 घंटे का समय निर्धारित किए जाने को लेकर आंदोलन पर चले गए थे। 1 मई, 1886 के दिन मजदूर लोग रोजाना 15-15 घंटे काम कराए जाने और शोषण के खिलाफ पूरे अमेरिका में सड़कों पर उतर आए थे। इस दौरान कुछ मजदूरों पर पुलिस ने गोली चला दी थी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की दूसरी बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें यह घोषणा की गई कि 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा। इसी के साथ भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में काम के लिए 8 घंटे निर्धारित करने की नींव पड़ी। भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत चेन्नई में 1 मई 1923 में हुई। भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी। यह दिवस मजदूरों की मजदूरी का वंदनीय दिवस है।
वैसे मजदूर शब्द की व्याख्या की जाए तो पता चलता है कि यह दुनिया दो वर्गों में बटी हुई है। एक तरफ वह वर्ग है जो उत्पादन के सारे कारक जैसे- ज़मीन, उपकरण व पूँजी के बल पर दुनिया रूपी बैल को हांकने का प्रयास करता है। इसे ही पूंजीवाद कहते हैं। दूसरी ओर वह वर्ग है, जिसके पास कुछ नहीं है, मजबूर है। वह मजबूत नहीं है। मजबूरी में अपना श्रम बेचता है। कार्ल मार्क्स ने इसे मज़दूर की संज्ञा दी है। पूँजिपति जब-जब मात्रा से अधिक अपना पेट भरने का प्रयास करता है तब-तब वह मजदूर के पेट पर लात मारकर उसका मेहनताना उससे छीनता रहता है। यही से आरंभ होता है- मजदूर विद्रोह। एक मई मात्र एक दिवस नहीं है। यह मजदूरों के द्वारा मजदूरी के लिए निरंतर संघर्ष के लिए प्रेरित करने वाला प्रेरक दिवस है।
मई दिवस के बहाने हमें मजदूरों को समझने का प्रयास करना चाहिए। मजदूर सदैव त्रिशंकु अवस्था में जीते हैं। दूसरों के सपनों को पूरा करने के चक्कर में अपने सपनों से दूर होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में वे न इधर के होते हैं और न उधर के। ऐसे त्रिशंकु जीव कहीं गटर में उतरकर तो कहीं रात में सोती दुनिया की सेवा के लिए सड़क पर जागकर झाड़ू लगाते नजर आते हैं। कहीं दिहाड़ी मजदूर के रूप में तो कहीं फेरी वाले के रूप में संघर्ष करते रहते हैं। देश का शायद ही ऐसा कोई हिस्सा हो जहां मजदूरों का खुलेआम शोषण न होता हो। आज भी स्वतंत्र भारत में बंधुआ मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद है। बंधुआ मजदूर स्वतंत्र देश में गुलाम बनकर जीवन जीने की पराकाष्ठा का सबसे घृणित चेहरे हैं। सबसे बदतर स्थिति तो बाल एवं महिला श्रमिकों की है। बच्चों व महिला श्रमिकों का आर्थिक रूप से तो शोषण होता ही है, उनका शारीरिक रूप से भी जमकर शोषण किया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इन पर जोरदार भाषण देने वालों के घर में ही इनके दर्शन हो जाते हैं।
वर्तमान में देशव्यापी लॉकडाउन से हर वर्ग प्रभावित हुआ है। किंतु सबसे अधिक दयनीय स्थिति में मजदूर वर्ग है। कोरोना के संक्रमण के डर के साथ ही बेकारी-भूख और दर-बदर की ठोकर खाने को मजबूर हुआ मजदूर तबका इन दिनों सबसे ज्यादा कष्ट में है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह मजदूर वर्ग ही औद्योगिक संस्थानों से लेकर महानगरों और कस्बों में आपूर्ति और सब प्रकार की व्यवस्थाओं के संचालन का आधार बनता है। परिणामस्वरूप निराशा, हताशा, बर्बादी और दर-बदर भटकने का प्रभाव इन्हीं पर सबसे अधिक देखने को मिलता है। जिस दिन देश का पेट भरने वाले किसान आत्महत्या का दामन छोड़ न्यूनतम समर्थन मूल्य के अधिकार प्राप्त कर सकेंगे, असंगठित क्षेत्र के मजदूर न्यूनतम वेतन की गारंटी पा सकेंगे और सभी कर्मचारियों के अधिकारों का ठीक-ठीक अनुपालन हो पाएगा उसी दिन मजदूर दिवस की सार्थकता का जश्न मनाया जा सकेगा। अन्यथा ऐसे दिन आते रहेंगे, जाते रहेंगे और मजदूर की हालत वही ढाक के तीन पात वाली होगी। इसलिए मजदूरों की महत्ता समझकर उनके साथ न्याय करना आज के समय की पहली प्राथमिकता है, क्योंकि –
किसी का मसीहा और किसी की जान होता है,
मजदूर मजदूर होने से पहले एक इंसान होता है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar