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विश्व होम्योपैथी दिवस 10 अप्रैल 2021

होम्योपैथी पूरी तरह से स्वस्थ और रोगमुक्त करने की एक संपूर्ण पद्धति

चिकित्सा विज्ञान की शाखा होम्योपैथी में न सिर्फ रोगमुक्त करने की क्षमता है, बल्कि संपूर्ण रूप से पूरे शरीर को नई काया मिल जाती है। होम्योपैथी गहराई तक असर करती है, क्योंकि यह मस्तिष्क के अहम हिस्से यानी अवचेतन स्थिति पर तेज गति से असर करती है और इसे असरकारक दवाओं से तैयार किया जाता है। हमारा पूरा शरीर सभी तत्वों और अंगों से ही पूरा होता है। इन दोनों का समावेश ही शरीर को प्राण देता है।
आधुनिक विज्ञान में चेतना की रचना अभी भी रहस्य बनी हुई है, वहीं होम्योपैथी ऊर्जा और चेतना को स्वस्थ रखती है। होम्योपैथी में प्राणदायी ऊर्जा को प्राथमिकता दी जाती है और जीवन ऊर्जा की शरीर में अहम भूमिका होती है। रोग के लक्षण इन्हीं ऊर्जा के बेमेल होने के कारण पनपते हैं और इलाज इन ऊर्जा को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए किया जाता है।
परंपरागत एलोपैथी संदेह के आधार पर काम करती है और अंगों (दिल, किडनी, लीवर आदि) के कार्य, संरचना (हड्डियों की स्थिति, फेफड़ों के फाइब्रोसिस, यूटेरिन फाइब्रोइड आदि) तथा रसायन (एसजीओटी, एसजीपीटी, पीएसए मूल्य, हीमाटोलॉजी, ईएसआर, सीआरपी, डी डायमर, ब्लड शुगर, कैंसर के निशान आदि) के कार्य को संपूर्ण शरीर के एफएससी के रूप में जाना जाता है।
सरल शब्दों में चेतन ऊर्जा जीवन संचार को संवेदी बनाता है और भौतिक परिमाण एवं ऊर्जा के बीच संबंध ही आधुनिक विज्ञान का मूल आधार है। होम्योपैथी भी इसी सिद्धांत पर आधारित है, जहां विश्व अदृश्य ऊर्जा की भौतिक अभिव्यक्ति है। इसके विपरीत आधुनिक विज्ञान मानव जीवन को कई खंडों में बांटता है। यही वजह है कि स्पेशलाइजेशन और सुपर स्पेशलाइजेशन की जरूरत महसूस हुई, लेकिन इसका कारगर परिणाम नहीं मिलता। अच्छे उपकरणों और शल्य क्रियाओं के बावजूद हम आत्मा और चेतना यानी प्राणदायी शक्ति को नहीं खोज सकते। उपकरण हमें सिर्फ संपूर्ण पैथोलॉजी तक गहराई तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं। मानव शरीर प्राणदायी शक्ति को छोड़कर सिर्फ बाह्य ढांचा को व्यक्त करता है।
शरीर की बदली पैथोलॉजी पर काम करने वाला रसायन पर्याप्त परिणाम नहीं देता है। कोशिकाओं की पैथोलॉजी किसी दैवी शक्ति के अधीन होती है, लिहाजा कोशिकाओं और उत्तकों की पैथोलॉजी में बदलाव लाने के लिए दैवी शक्ति के अधीन लाना ही बेहतर है। शरीर में लाखों-करोड़ सैनिक तत्व की तरह काम करते हैं और उनका एक ही कमांडर दैवी शक्ति ही है। लिहाजा कमांडर को बदल देने से शरीर की पूरी पद्धति ही नए रूप में आ जाती है।
200 साल पहले डाल्टन के परमाणु संरचना सिद्धांत और रदरफोर्ड की न्यूक्लियस की खोज से पहले ही डॉ. हनीमैन पोटेंटाइजेशन की अवधारणा के आधार पर एनर्जी मेडिसिन के युग में पहुंच चुके थे। जिस तरह क्वांटम भौतिकी में सभी तत्वों का निर्माण एक ब्लॉक के रूप में माना है। उसी तरह होम्योपैथी में दैवी शक्ति को माना जाता है। यही सिद्धांत होम्योपैथी से उपचार के संदर्भ में काम करता है। इसके जरिये शरीर की सभी संरचनाओं को ऑर्केस्ट्रा के संगीत उपकरणों की तरह फाइन ट्यून किया जाता है, ताकि शरीर खुद को अच्छी तरह रिसेट कर सके।
सही होम्योपैथी उपचार से व्यक्ति अपने शरीर की स्वाभाविक प्रकृति हासिल कर लेता है और जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य हासिल करता है। इसमें गहन और परम उपचार प्रक्रिया से सेहत को पूर्व अवस्था में लाया जाता है। सभी होम्योपैथी उपचार प्रकृति में उपलब्ध तत्वों से किया जाता है, जिसमें जड़ी बूटी से लेकर मिनरल और पशु उत्पादों का इस्तेमाल होता है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से तैयार उपचार प्रक्रिया में अब तक कोई कृत्रिम तत्व नहीं पाया गया है। इस उपचार के जरिये शरीर अपने आप ठीक होने लगता है और स्वाभाविक आदेश, संतुलन और तालमेल बनाने लगता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के लक्षण स्वाभाविक रूप से उभरने लगते हैं, जिसका मतलब है कि ये लक्षण अपने भावनात्मक मार्ग की बढ़ रहे हैं। परंपरागत चिकित्सा में ऐसा नहीं होता है। यह सिर्फ भौतिक और रासायनिक स्तर पर काम करता है न कि ऊर्जा स्तर पर। भौतिक स्तर पर मानव अहं सर्वोच्च स्तर पर होता है और परम सत्य हासिल करने का दावा करता है, जिसमें दैवी शक्ति से हमारे वजूद की भावना नहीं होती है। लिहाजा होम्योपैथी से उपचार की संपूर्ण प्रक्रिया के जरिये मैंने बताने की कोशिश की है कि परंपरागत एलोपैथी पद्धति से यह पूरी तरह अलग कैसे है। लेकिन दुर्भाग्य है कि होम्योपैथी की खूबसूरती को अभी भी पूरी तरह नहीं समझा जा सका है और मुझे लगता है कि यदि होम्योपैथी की संचालन प्रक्रिया को विश्व के बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों के बीच विस्तार से बताया जाए तो निश्चित रूप से रोगों के उपचार में यह चमत्कारी साबित होगी और महामारी के इस दौर में लोगों के कष्ट दूर करेगी। मानवता के प्रति अपार स्नेह और सेवा के मैं हमेशा तैयार हूं।

 

डॉ. रमाकांत जगपाल

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