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यमराज अब प्राण लेवते हारे!

जीवन सारा सिसक रहा है, देखो नेता चहक रहा है।
नहीं खाली कोई शमशाना, भर गए सब कब्रिस्ताना।
जनकवि कोरोनादास कहते हैं कि सारा जीवन ही सिसक रहा है। हर एक दिशा में दर्द मार्केट में बिक रहा है। इन सिसकियों के बीच ही नेता अपने वोटों की फसल को देखकर चहक रहा है। होटल देखते ही उसका जीवन महक रहा है। इधर कोरोना से कोई भी श्मशान खाली नहीं है। सारे कब्रिस्तान भर गए हैं। ऐसा कहते हुए कवि कोरोनादास जीवन की नश्वरता एवं नेताओं की अमरता को प्रकट करते हैं।

नेता लोग खेलते खेला, लगा शवों का बड़ा झमेला।
अस्पताल सब हुए कोरोना, हवा-दवा का रोना-धोना।
हर जगह शव बसरे पड़े हैं। गलियों में, चौबारे में! बागों में, बहारों में! मैं आऊं, आजा का गीत शव गा रहे हैं। शव लाइनों में पड़े पड़े शृंगार रस के गीत गा रहे हैं। अस्पतालों को खुद कोरोना हो गया है। अस्पताल खुद वेंटिलेटर पर पड़े तड़पड़ा रहे हैं। यहां दवा की काली-पीली लाल-बाजारी चल रही है। यहां प्राण वायु की बड़ी मारामारी चल रही है। ऐसे में नेता लोग अपना खेला खेल रहे हैं। वे जनता पर बड़ा झमेला पेल रहे हैं।

यमराज अब प्राण लेवते हारे, नेता मारे खुद जयकारे।
अट्टहास लगाए रावण कंसा, उड़ चला प्राण पखेरू हंसा।
यमराज का भैंसा साइड में खड़ा होकर हांफ रहा है। यमराज अब कोरोना के नजदीक जाते हुए कांप रहा है। यमराज का पिछले साल से ही ओवर टाइम का वेतन बाकी पड़ा है। इस मरणीय वातावरण में नेता अपनी पीठ थप-थपाने लगा है। रावण और कंस अपने महलों में अट्टहास लगाते भोग-विलास में व्यस्त हैं। आम जनता के प्राणों को लेकर उसका हंसा किसी दूसरी दुनिया में जाने के लिए उड़ान भर चुका है। कोरोनादास ने इस चौपाई में कोरोना काल के जीवन को सांगोपांग रूप प्रस्तुत किया है।

बजटाती गीत कोरोना गाए, बात-बात में बजट बढ़ाते जाए।
हवा-दवा दलाल कुटते पैसा, मरण-मसान खेलते भैसा।
बजट का निर्माण करने वाले बजटाती लोगों का समूह कोरोना का स्तुति गायन करने में लगा है। ये समूह हर बात में बजट बढ़ाते हुए इसे आसमान में ले गया है। इस बजट में से नेता व दलाल हवा-हवाई, पानी-बिजली, दवा-दवाई आदि के बहुगुणक रूप में डॉलर कूट रहे हैं। यह सारे मतवाले भैंसे के समान पद-मस्त होते हुए मसान-उच्चाटन, मरण-उद्घाटन का खेल-खेल रहे हैं। वे अपने बजट को कोठी, कन्या, कार हेतु सुरक्षित रख रहे हैं। कवि ने कोरोना काल के बजट का दलाल-रूप एवं काला बाजार का मनोहर चित्रण किया गया है।

बीते माह साल भर रीते, नां ही रागिनी नां ही गीते।
तड़प सिसकता जीवन सारा, प्राण हुआ कोरोना मारा।
कोरोना-कोरोना करते-करते दिन, महीने, साल गुजर गए हैं। दिन, महीने, साल गुजरते जाएंगे! देखेंगे! देख लेना!! जैसे गीतों की धमक के आगे अब न कोई राग है ना रागिनी! जीवन के सब रंग-ढंग गायब हो गए है! सारी रंग-रागनियां समाप्त हो गई है। जीवन तड़पता-सिसकता ही दिखाई दे रहा है। यह परदेसी प्रीत लगाने वाला कोरोना हर एक प्राण को अपने साथ ले जाने के लिए अपने क्रॉउन झटकाने लगा है। कवि ने कोरोना काल के रसमयी जन चित्रण को उकेरा है।

 

रामविलास जांगिड़

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